‘मैं’ है नहीं फिर आता कहाँ से,
वही है कण कण में, ‘मैं’ आता कहा से,
वह अव्यक्त पल पल व्यक्त होता है,
‘मैं’ अव्यक्त से सदा अनभिज्ञ रहता है.

‘मैं’ है अशांत अपने होने से,
भयाक्रांत है उसमे खोने से,
‘मैं’ नित नये रूप संजोता है,
‘मैं’ शांति मे कब होता है.

‘मैं’ काम का परिणाम है,
इसीलिए ‘मैं’ बस एक नाम है,
देखता है ‘मैं’ जब भी दर्पण, नाम नज़र आये,
ऐसा दर्पण कहा से लाये, जहाँ राम नज़र आये.

प्रतिक्षण नये स्वांग रचता यह ‘मैं’,
इसीलिए आनंद को तरसता यह ‘मैं’,
‘मैं’ ही सब कुछ किये जा रहा है,
इसीलिए भय में जिए जा रहा है.

क्या ‘मैं ‘ है भी, या वही है,
‘मैं’ कहाँ से आया कुछ पता नहीं है,
‘मैं’ अगर, मैं ही रहना चाहेगा,
तो यह ‘मैं’ कब विश्राम पायेगा.

‘मैं’ जन्म से कुछ ढूंढ रहा है,
लेकिन उसमे खोने से आंखें मूँद रहा है,
‘मैं’ उस तक कभी नहीं पहुँच पायेगा,
शायद वह ही उस तक पहुंचाएगा.

कब तक दर दर भटकेगा यह ‘मैं’,
कब तक आजादी को तड़पेगा यह ‘मैं’,
यह ‘मैं’ ही है घुटन और निराशा,
अब इस ‘मैं’ की वही है आशा.

क्या ‘मैं’ अपने होने से मुक्त होना चाहता है,
या अभी अपने होने के स्वपन संजोना चाहता है,
गर रस है इसको अपने होने में,
फिर क्यों तड़पता है यह अँधेरे कोने में.

धारणाओं में अटका ‘मैं’ एक नाम,
नहीं पर सका यह कभी विश्राम,
‘मैं’ है कब से बस एक नाम,
अब ‘मैं’ अनाम होना चाहता है.

प्रगट होता रहा सत्य, अनगिनत रूपों में,
लेकिन ‘मैं’ सोता रहा अंधकूपो में,
अब ‘मैं’ यहाँ नहीं होना चाहता,
‘मैं’ अब और नहीं सोना चाहता.

‘मैं’ को बुद्ध बनने की अब चाह नहीं,
कुछ बन जाना इसकी राह नहीं,
बस मैं अब ‘मैं’ नहीं होना चाहता,
अब ‘मैं’ उसे नहीं खोना चाहता.

‘मैं’ कब से प्यासा है,
बस अब उस सावन की आशा है,
अब तो कोई ‘मैं’ मिटा दे,
अब तो कोई शून्य खिला दे.

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