यात्रा, है यह अनन्त की,

अनुभूति यह है, किसी संत की.

 

यात्रा का कोई गंतव्य नहीं,

पथिक का यहाँ,  कोई अपना मंतव्य नहीं.

 

यहाँ पथिक नहीं,  कभी विश्राम है पाता,

विश्राम पाते ही यहाँ पथिक गुमनाम हो जाता.

 

चलते चलते यहाँ पथिक का अंत निश्चय है,

यही अनन्त के पथिक का परिचय है.

 

यह यात्रा है परम शांति की,

यहाँ मंजिल की बात है बस भ्रान्ति की.

 

इस मार्ग में बहुत अंधेरा है,

पथिक का प्रज्जवलन ही यहाँ सवेरा है.

 

होश में ही इस पथ पर कदम बढ़ाये जाते है,

इस यात्रा में पद्चिन्ह बनाये नहीं, मिटाये जाते है.

 

यह यात्रा पथिक का अरमान नहीं,

अरमानों को लेकर चला जाये, ऐसा यह सोपान नहीं.

 

यात्रा में प्यासा क्षीर कभी ना खोज पाता है,

पिपासा गहरी होने से, प्यासा क्षीरसागर हो जाता है.

 

यात्री की यहाँ यही पुकार हो,

पतंगे की तरह दग्ध होना, पथिक को स्वीकार हो.

 

पथिक, तू चलता जा, और गंतव्य की दुहाई ना दे,

होश रख, यात्रा में तेरे पदचाप किसी को सुनाई ना दे.

 

यात्रा में हर कदम पर तेरा विश्वास बढ़ता जाये,

मृत्यु में, तेरा पल पल विश्वास बढ़ता जाये.

 

यात्रा का पथ रोशन होगा तेरे जल जाने से,

एक कदम भी ना चल पायेगा,  अपने को बचाने से.

 

इस अज्ञेय की यात्रा में तुझे अपना ज्ञात होगा,

तभी यात्रा के रहस्य का सूत्रपात होगा.

 

 

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