होश सम्भालने के पश्चात जब भी पारिवारिक शादियों में गई हूँ या किसी और समारोह में गयी हूँ ।छुट्टी होने पर अक्सर बुआ,मामा, मौसी के घर जाना होता था।लेकिन आज कल ये यात्राएं करना आभासी (Virtual) हो गया है या यू क़हिए डीज़ीटल हो गया है ।रिवाज़ है छुट्टी ख़त्म होने पर जब मुख अपने घर की ओर करती हूँ तो एक-दो बिना सिले हुए सूंट दे दिए जाते हैं और हंसते हुए कहा जाता है कि सिला लेना लेकिन सही में मैं उन्हें सिलाऊँगी या नहीं इस बात का जवाब आपका और मेरा आंतरिक मन अच्छे से जानता है ।(इसमें अपवाद आमंत्रित हैं)हाँ यही एक दो सूंट जिनकी जगह माँ की संदूक में पक्की है वह कुछ समय के लिए ठहरेंगे और फिर किसी नई यात्रा पर निकल पड़ेंगे।कुछ दिन कुछ महीने कुछ सालों में न जाने कितनी यात्राएँ, कितनी दूरियाँ तय करते हैं ये यात्री सूंट।

पहली संदूक,दूसरीसंदूक, तीसरी संदूक और न जाने कितनी
दूरियां बढ़ाते हैं या मिटाते हैं? शंका बस इतनी

उजले सितारों से हम,तो कभी नीले आसमान से।
कभी बारीकी से बुने तो कभी एक में अनेक रंग सिमटे।।

श्रमिक के तन की शोभा बढ़ाते मटमैले मिट्टी के रंग से।
और ऊँची दिवारों के पार भी हम ही बसे।।
 
सावन की बूँद गिरे हम पे ,तन छुटाए न छूटे ।रिश्तों की कद्र हम से ही है, नाते भले ही सच्चे या झूठे ।।
 

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Manisha Nandal Dahiya

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