* लहरों का निमंत्रण*…….
नीत नये होते पल, तट से  चला जा रहा जल,
क्षणिक होता आज कल, स्वरित जल बहता
कल कल,
लहरों में प्रवाह स्पृहा, नौका ढूढ़ने जाऊ कहा?
लहर ‘आती’ निर्णायक गतिमान आशा,
प्रतीक्षा मैं चंचल नवीन अभिलाषा,
कहि साधन है पास मेरे वही
सामने खड़ी नौका,
अवलम्भं करु तो तर जाऊ
पर लहरों में खोने की बिपाशा।।

स्थिरता मैं तट खड़ा, रुख बदलते कई देखे,,
हवा बदली, पतवार बदला, ओर भी बदलाव कई देखे,,
हूँ एक श्रमिक पर, गोताखोर के व्यापार अधिक देखे,,
चलती नौका से बहाव बदलते  कई देखे।।

लहराति गति मंद हूईंक कहा~परिवर्तन को नियम समझ,

गोता लगा “मैं” को नया समझ,

धीरता से पॉव बढा, अनश्चिता होती दीर्घ बडी,
जर्जरता मैं कटी जिंदगी,जीने मे आनंद समझ।।
सुन लहर ! कार्य नौका बडी, ठहरा मैं छोटा नाविक,
माँझी जैसा कुछ नहीं,  मझदार मै खोना हैं काल्पनिक,
ज्यादा गहरा रखना जल-आँचल, नहीं तो तय है डूबना,
तट पर से पर जाना है,क्या मैं त्यागू?,क्या  मैं भूलूँ मुझे यही हैं सीखना,
आलिंगन देना फिर कभी-आऊंगा जब कभी, रहेगा ये भी एक स्वप्निक।।

आज नही रे!कल लहर,
पल नहीं किसी ओर पहर,
अस्वीकार होता ये आमंत्रण,
क्या तट पर रूकूं, हो जब लहरो का निमंत्रण।।

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Rachit Divj

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