कुछ ऐसी विशेष घोषणा हुई कि असंख्य शंखों का वादन शुरू हो गया क्यों कि श्री हरि और देवी लक्ष्मी का आगमन हो रहा था। भगवान और देवी अपने वाहन पक्षीराज गरुड़ पर ही सवार हो कर आए थे। जैसे ही भगवान और देवी अपने वाहन से नीचे उतरे, वाहन गरुड़ और उनके आयुधों शंख, चक्र, गदा ने सुंदर देवपुरुषों का स्वरूप धारण कर लिया और अंगरक्षकों जैसे श्री हरि के पीछे आकर खड़े हो गये।

वरदान 2श्री हरि के श्री मुखमंडल पर सबकी दृष्टि ठहर गयी थी। एक ही लय में बज रहे मृदंगों और शंखों के मधुर संगीत से उनका स्वागत किया गया और साथ में गाया जा रहा था—

ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय !

लगभग ७ फूट ३इंच के थे श्री हरि। श्री भगवान ने पीले रंग का रेशमी अंग वस्त्र और सफ़ेद रंग की धोती धारण की हुई थी। श्री विष्णु सांवले नही बल्कि हल्के नीले रंग के थे। उनका ललाट काफ़ी चौड़ा और तेज से भरा था। उस पर चंदन और केसर से मिश्रित तिलक लगा था और मध्य में एक लाल रंग की रेखा थी। उनके नेत्रों का रंग भी हल्का नीला था और बहुत ही विशाल नेत्र थे। इसी कारण उनकी स्तुति में उन्हें पुण्डरीकाक्ष भी कहा जाता था। उनका वक्ष स्थल चौड़ा और कौस्तुभ मणि धारण करने के कारण बहुत ही आकर्षित लगता था। कौस्तुभ मणि जो कि समुद्र मंथन के दौरान समुद्र में से निकली थी। और दैत्यों एवं देवों की ओर से श्री हरि भगवान को उपहार में दे दी गयी थी। श्री हरि की भुजायें और कंधे देखने में अत्यधिक बलिष्ट थी, शायद गदा का अत्यधिक अभ्यास करने से भुजायें और कंधे अपने पूर्ण आकार में थे। श्री हरि बहुत ही कम लेकिन हमेशा मुस्कुरा कर और सहजता से बात करते थे। श्री भगवान की दृष्टि और चाल इतनी तीव्र थी जो कि हृदय के अंदर तक प्रभाव छोड़ने वाली थी।

(अन्य पुरुषों में ये संयोग बिल्कुल उल्टा होता है, बोलेंगे ज़्यादा बाक़ी काम आराम से करते है। लेकिन यहाँ तो हम श्री हरि जो पुरुषोत्तम है, उनकी बात कर रहे है।)

श्री हरि का मुकुट काफ़ी बड़ा और उसमें बहुत ही महीन रत्न जड़ित थे। लेकिन दूर से मुकुट में जड़ित आपको मुख्य दो अमूल्य मणियाँ ही दिखाई दे रही थीं। कानों के कुंडल बहुत बड़े नही थे लेकिन उनकी मीनाकारी बहुत बारीक थी। गले की शोभा हीरे और सुवर्ण  से निर्मित एक छोटा सा हार और सुगंधित वैजयन्ती माला थी। करकमलों में एक एक भारी सोने और हीरे से निर्मित कंगन थे। श्री हरि की उपस्तिथि में सारे वातावरण में एक भीनी भीनी महक आ रही थी, जिस से हर कोई मद मस्त हो रहा था। इस समय श्री हरि के समक्ष केवल आँख झुका कर ही खड़ा हुआ जा सकता था। क्यों कि मुकुट की दोनो मणियों और कौस्तुभ मणि की रोशनी इतनी दिव्य थी कि श्री हरि को निकटता से आँख भर कर केवल उनकी इच्छा से ही देखा जा सकता था। अधिक्तर श्री हरि के समक्ष नेत्र उनके तेज के कारण झुक जाते थे।

श्री हरि की अर्धागिनी देवी लक्ष्मी का तो कहना ही क्या। देवी लक्ष्मी का प्राक्टय भी समुंदर मंथन के समय हुआ था। इस से पहले दैत्य और देवता कोई ओर मन में भाव लाते, श्री हरि देवी माधवी का पाणि ग्रहण कर चुके थे। कौस्तुभ मणि तो उपहार में मिली थी लेकिन भगवती देवी लक्ष्मी का चयन श्री हरि की इच्छा थी। माँ लक्ष्मी बहुत ही सुंदर लग रही थी। गुलाबी रंग की साड़ी पहने, देवी माँ स्वर्ण की प्रतिमा लग रही थीं। माँ के कमल आकार का स्वर्ण निर्मित माँग टिका लगाया हुआ था, गले में नाना प्रकार के स्वर्ण और हीरे के हार शोभा पा रहे थे। दोनो नासिकायों में हीरे जड़ित अमूल्य बिंदु शोभा पा रहे थे। दोनो कर कमलों में असंख्य चूड़ियाँ शोभा दे रही थीं। माँ ने आज अपने केशों को सोने की पतली धांगों से गोल करके बांधा हुआ था, जिस से माँ के केश स्वर्ण के धागे जैसे ही लग रहे थे। जैसे जैसे माँ चल रही थी, वहाँ की भूमि, स्वर्ण और अमूल्य रत्नों को उगल रही थी।वरदान 3

देवी लक्ष्मी के लिए गाया गया:-

नमस्तेस्तू महामाये श्रीपिठे सूरपुजिते ।
शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ १ ॥

नमस्ते गरूडारूढे कोलासूर भयंकरी ।
सर्व पाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ २ ॥

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी ।
सर्व दुःख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥३ ॥

सिद्धीबुद्धूीप्रदे देवी भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी ।
मंत्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ४ ॥

देवी माधवी, श्री हरि का अनुसरण करती हुई अपने मंच की तरफ़ बढ़ रही थी कि उन्होंने देखा कि कुछ ही पगों में श्री हरि अपने मंच पर जाने की बजाए, घोषणा स्थल पर पहुँच गये। और सभी जन श्री हरि को देख कर ‘श्री हरि भगवान की जय’ के नारे लगाने लग गए।

‘हर हर महादेव’ भगवान ने घोषणा स्थल पर पहुँचते ही महादेव का नारा लगाया।

और वरद हस्त मुद्रा में बोले,“आज के इस पावन अवसर पर जो भी उपस्थित है, चाहे वो किसी भी योनि में है, जड़ या चेतन है आदि सभी को मैं अनंत काल के लिए शिव भक्ति का वरदान आशीष में देता हुँ।”

ऐसा सुन कर वहाँ की प्रकृति ने पुष्प वर्षा शुरू कर दी, और जय जय कार होने लगी। ऐसा क्षण तो कई करोड़ मन्वनतरों में भी नही आता, जब श्री हरि, महादेव की भक्ति का वरदान प्रदान करें। वो भी किसी एक व्यक्ति विशेष को नही बल्कि समूह को, वो भी एक साथ। ऐसा क्षण केवल ईश्वर कृपा से ही प्राप्त होता है।

गणेश-कार्तिकेय, श्री ब्रह्मा-देवी सरस्वती और १५ देवी नित्याओं ने श्री हरि और देवी लक्ष्मी का अतिथि अभिनंदन किया और सभी ने श्री हरि और देवी के लिए आरती गयी:-

जय जय…आरती हरि तुम्हारी…
विष्णु प्रभू श्री नाथ मुरारी…आरती हरि तुम्हारी

पीताम्बर वैजयन्ती माला
मेघवर्ण भुज नयन विशाला
आरती हरि तुम्हारी
जय जय
आरती हरि तुम्हारी

देवी माधवी और श्री हरि ने अपना आसन ग्रहण कर लिया था, अब केवल इस समारोह के नायक और नायिका की इंतज़ार थी।

और दूसरी तरफ़ महल में केवल माँ और महादेव ही रह गये थे। माँ एक अद्वितीय सुंदरी लग रही थी। माँ ने गहरे लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जिस पर सोने की तारो का काम किया गया था।  खुले केशों में माँग पट्टी में कुम कुम  से एक अद्भुत सोने का बड़ा गोल माँग टिका सजा था। माँ के लम्बे केश घुटनों तक लम्बे थे और एक चूड़ामणि से केशों की दोनो तरफ़ की दो लटों को बांध कर केश सज्जा की गयी थी। माँ के गले में भिन्न भिन्न प्रकार के आभूषण थे। शीश से लेकर चरणों तक सुहाग के चिन्हों को धारण किए माँ आज किसी दुल्हन से कम नही लग रही थी।

और हमेशा की तरह माँ चाहती थी कि महादेव थोड़ा सा अच्छे से बन संवर कर जाए—

“अरे, आप अभी तक ऐसे ही है। हम आपके मंगल अभिषेक के लिए जा रहे है, ना की समुद्र मंथन के लिए।”

“वही तो, मंगल अभिषेक के बाद भी तो सब बदलना ही है।”

“महादेव, कभी तो पुराना चलन तोड़ दिया कीजिए, वहाँ पर सभी इतने समय बाद आपको देखेंगे। विशेष कर माता मैना के बारे में सोचिए। जो हमारे विवाह के समय आपको देखते ही बेहोश हो गयी थी।”

“सोच लो, कल्याणी! मैं अपने नेत्रों से किसी की दृष्टि नीचे उतरने ही नही दूँगा।” महादेव ने हँसते हुए कहा

“कृपया, अभी व्यंग नही। अभी सब प्रतीक्षा कर रहे होंगे। आपकी यह सेवा में स्वयं करती हुँ।”

ऐसा कह कर माँ ने महादेव को दर्पण के सामने, एक आसन पर विराजमान करवा कर शिव के श्री मस्तक पर दिव्य विभूति से त्रिपुंड लगा दिया और त्रिपुंड के मध्य महादेव की तीसरे नेत्र की लाल रेखा ऐसे लग रही थी, जैसे क्षितिज पर धरा और अम्बर का मिलाप होता है।

“देखो कल्याणी, केवल आप ही मुझे धारण नही करतीं, बल्कि मैं भी आपको धारण करता हुँ।”

माँ, महादेव की सौंदर्य सेवा कर रहीं थीं और साथ में महादेव कुछ कुछ व्यंग में बोल कर वातावरण को ख़ुशनुमा कर रहे थे। फिर माँ ने मुस्कुराते हुए, महादेव को रुद्राक्ष की मालाएँ धारण करवायीं। अर्धचंद्र महादेव की जटायों में सुसज्जित किया। नए कुंडल धारण करवाए। कमण्डल और त्रिशूल हाथ में लेकर महादेव बिल्कुल तैयार थे।

उतरी हुई सिद्ध रुद्राक्ष मालायों, दिव्य कर्ण कुंडलों और विजय आसन बाघछाल को महादेव या तो किसी उच्च साधक को साधना सिद्ध करने के लिए दे देते थे, या यह महादुर्लभ आशीष किसी योग्य योद्धा याचक के लिए कवच का कार्य करती था। अन्यथा महादेव की आज्ञा से उन्हें अग्नि प्रवाह या जल प्रवाह कर दिया जाता था ताकि कोई उनका दूरुपयोग ना कर सके।

वरदान 4हमेशा की तरह माँ पार्वती और महादेव मानसरोवर की ओर बिना किसी विमान के वायु मार्ग से चल पड़े। जैसे ही उन्होंने समारोह स्थल में प्रवेश किया। चारों ओर से हर हर महादेव की जय जय कार होने लगी।

सभी अपने अपने स्थान पर खड़े होकर पुष्प वर्षा कर रहे थे, जिस में कुम कुम, केसर, चावल के दाने आदि मिश्रित थे। हीरे, माणिक्य मोती, स्वर्ण और चाँदी का कोई मूल्य नही था यहाँ। इस समय केवल मनोभाव का मूल्य था।

To be continued…

           सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके। 

           शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

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