हम तीन दोस्त बम बम, अंशु और मैं एक बार परीक्षा देने के लिए बेगूसराय से प्रयागराज की ओर जा रहे थे हम तीनो ट्रेन में सवार हुए। हम सब के पास कुछ ना कुछ नाश्ते की सामग्री थी और थोड़े बहुत पैसे थे बेगूसराय स्टेशन पर गाड़ी में दाखिल हुए । ट्रेन में बहुत भीड़ थी जब गाड़ी कुछ आगे निकल गई तो हमने पाया की एक करीब 65 साल की  स्त्री बहुत अधिक भीड़ होने की वजह से अपने आप को कंफर्ट फील नहीं कर पा रही थी उसके चेहरे के हाव-भाव को हमने पढ़ा हमें लगा कि शायद यह बहुत दुख में है और इन्हें सिर्फ सीट ना मिलने का ही दुख नहीं है और भी कुछ समस्याएं है। मैंने उससे सबसे पहला पर इसलिए पूछा कि आप कहां जा रही हो क्या आपको सीट चाहिए, और इतना कहकर मैं अपनी जगह से उठ गया फिर उनको वहां विठाला अब उनसे बातचीत का दौर मेरा शुरू हुआ मैंने उनसे पूछा कि आप इस उम्र में अकेले क्यों जा रही हो क्या आपका कोई लड़का नहीं है जो आपको अपने साथ ले जाए फिर उनके जवाब सुनकर मैं कहां खो गया उन्होंने कहा,”मेरा लड़का अल्लाह के पास पहुंच गया मुझे गणेश नाम का एक हिंदू अपने घर में मां की तरह रखता है वही भोजन देता है और मेरा मरद दिल्ली के किसी मस्जिद में रहता है अब मैं उसी के पास जा रही हूं मेरे जीवन में बहुत कठिनाइयां हैं।”इस तरह उन्होंने अपनी बहुत ही दुख भरी कहानियां सुना दी।

               हम सनातनी में एक सबसे खास बात यह है हम बहुत जल्द भावना में बह जाते हैं और यही हुआ। मुझे तुरंत उसके ऊपर दया आ गई मैंने अपने थोड़े से पैसे में से ₹50 निकालकर उनकी हथेली पर रख दिए और कुछ नाश्ता भी रख दिए ।मुझे देख देख कर मेरे दोनों दोस्त ने  ₹100 के नोट और अपने अपने नाश्ते उन्हें दिए और इस दृश्य को देख कर के बगल के करीब 10 लोगों ने कुछ पैसे और कुछ भोजन सामग्री उस मुस्लिम महिला को दिया। वह महिला अब बहुत खुश नजर आ रही थी मैंने उसे बताया कि आप राजेंद्र नगर स्टेशन पर उतर जाना मैं आपको उतार दूंगा और वहां 5:30 बजे शाम में आपको संपूर्ण क्रांति मिलेगी और उससे आप दिल्ली पहुंच जाना ।खाने-पीने और धन की उसके पास प्रचुर व्यवस्था हो गई थी अब वह निश्चित थी।जब राजेंद्र नगर स्टेशन आया तो हमने उन्हें गाड़ी से नीचे उतार दिया और इंतजार करने के लिए दूसरी गाड़ी का । हम तीनो दोस्त अपने आप में बहुत ही संतुष्टि का अनुभव कर रहे थे ।हमें लग रहा था कि हमने कोई नेक कार्य किया है और मनुष्य होने का धर्म निभाया है क्योंकि हमारा धर्म ही हमें सिखाता है 

अयं निज: परो वेति गणना लघु चे त साम

उदार च रिता नाम तू वसुधैव कुटुंबकम

              अर्थात हमारे लिए संपूर्ण पृथ्वी ही अपना परिवार के समान है हमें किसी से भेदभाव नहीं रखना है साथ ही यह भी सिखाता है यह भी सिखाता है कि

सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित् दुख भाग भवेत्   

                     अर्थात सभी सुखी हो सभी निरोग हो कोई भी कभी भी दुखी ना हो ।अर्थ स्पष्ट है कि हमारा सनातन धर्म संपूर्ण सृष्टि के कल्याण की बात करता है उसके दुख से दुखी होकर उसके मदद की बात करता है। और हम भले ही अन्य लोगों के विचारों को भलीभांति जानते हो लेकिन जब बात किसी के दुख को देखने की आती है तो वहां हम भावना में इतने भर ही जाते हैं कि अपनी आंखों के सामने किसी की तकलीफ को नहीं देख सकते ।यह कहकर मैं अपनी बड़ाई नहीं कर रहा लगभग हर सनातनी विचार वालों के अंदर ऐसी ही प्रवृत्ति पाई जाती है ।यह सत्य है कि मैंने गीता के साथ ही कुरान की भी कुछ आयतें अवश्य पढ़ी हैं अगर  उसेे यहां लिख दूं तो निश्चित रूप से सबके मन में या भाव जरूर आ जाएगा कि धर्म और मजहब में बहुत बहुत अंतर है। दोनों की शिक्षाओं में बहुत अंतर है पर यह जानने के बावजूद भी कहीं ना कहीं हमें अपने सनातन धर्म के सिद्धांतों से बेहद प्रेम है इसलिए हम जब सेवा के भाव में होते हैं तो किसी की जाति मजहब संप्रदाय नहीं देखते बल्कि उसको एक मनुष्य के रूप में देखते हैं और यही हमारी सनातन संस्कृति का सिद्धांत है अतः हमें सनातनी होने पर गर्व है । हमारे यहां जहर उगलने वाले साांप को  भी दूध पिलाने की परंपरा है ।हमारे यहां प्रकृति को भी ईश्वर के रूप में पूजने का विधान है और हर विधान के पीछे एक सैद्धांतिक और वैज्ञानिक रहस्य काम कर रहा होता है। किसी दूसरे दिन पोस्ट करूंगा कि हमारी जो भी परंपराएं हैं जो भी रिती रिवाज हैं उसके पीछे एक विशुद्ध वैज्ञानिक तथ्य है कुछ भी नियम यूं ही नहीं बना दिए गए हैं ।इस पर अगले दिन लिखूंगा आज के लिए इतना ही ओम स्वामी परिवार के सभी सदस्यों को भाई बहनों को मेरा प्रणाम जय श्री हरि।

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Ashu Harivanshi

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