स्वप्नलोक के दिव्य जगत में, दर्शन श्रीहरि ने दिए।

ज्योतिर्मय थे तारणहार, करुणामयी मुस्कान लिए । 

 

मुझे याद है, मुझसे बोले, “मांगो वत्स जो चाहते हो”।

मैने कहा “ठीक है भगवन, सब कुछ दो गर देते हो।

 

दिनकर जैसा तेज दिला दो, मयंक सी कुछ शीतलता।

चंदन जैसी महक मिले औ’, फूलों जैसी कोमलता।

 

वाणी हो कोकिला सी मेरी, कामदेव सी सुंदरता।

ब्रह्माजी से ज्ञान दिला दो, और रमा से चंचलता ।

 

समाधिता हो शशिशेखर सी, विष्णुदेव सा ध्यान–मनन।

बल और भक्ति हनुमत जैसी, नारद मुनि सा परिहसन।

 

मां बुद्धिदायिनी विद्या दें, मिले मां दुर्गे से ममता।

शक्ति मिले मां महाबला से, मां गंगा से पावनता।

 

करुणा मिले रामचंद्र सी, नटवर सा मतवलापन।

ऐसा ही वर देदो भगवन, खिल जाए मम अंतर्मन।

 

ईश्वर बोले, “दो मनुजों को, कैसे एक जैसा वर दूं।

हां जिन्हें मिल चुका है वर ये, तुम्हें कहो तो मिलवा दूं।

 

मिलाए कर मैं बोला “भगवन, क्या कोई ऐसा जन है 

जिसमें सब के सब गुण हैं ये, अब तो मिलने का मन है ।

 

“एवमस्तु” और भगवन गायब, त्यों ही आप मिले मुझको।

ऐसा दिव्य पुरुष दिखलाया कोटि नमन भगवन तुझको।

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Devendra

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