”तुम्हारी कवितायें पढ़ रहा था। इतनी-सी उम्र में ऐसा भीषण वैराग्य! भक्ति तक बात समझ आती है। चलो, ध्यान करती हो यह भी हज़म कर लिये। पर ऐसा गहरा वैराग्य कहाँ से आ जाता है तुम में?”

एक सरल-सी मुस्कुराहट चेहरे पर आ गयी। मेरे मित्र ने जिज्ञासावश जीवन का सत्य ही पूछ लिया था। उसे लेकर एक श्मशान पहुँची। धधकती लाश के उपर रेंगते उस धूसर धूएँ में सच सबसे साफ़ नज़र आता है।

एक अज्ञात चिता जल रही थी। आस-पास कोई सगा-संबंधी ना था। शायद उस इंसान के आगे-पीछे कोई ना था। लाश के आगे-पीछे कोई होता भी नहीं है।

हाथ पकड़ कर मैं अपने मित्र को लाश के पास ले गयी। चेहरे के भाव से ज़ाहिर था कि भय, घृणा और झुंझलाहट नें उसे घेर रखा है। श्मशान के स्वागत का तरीका ज़रा निराला होता है। धधकती लाश से मांस का एक अधगला टुकड़ा आकर हमारे पैरों के पास गिरा। मेरे मित्र के चेहरे का रंग सहसा बदल गया। भय और घृणा का स्थान अब अवसाद और शांति ने ले लिया था। जब मैंने उसकी दृष्टि टटोली तो पाया कि उसकी नज़र एक टक उस लाश की बायीं कलाई को देख रही थी जिनमें दो हरे काँच की चूड़ियाँ धीमें-धीमें पिघल रही थीं।

मैंने पूछा, ”क्या हुआ? ठीक तो हो ना तुम?”
उसने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा, ”मृत्यु कितनी अकेली होती है। कोई आस-पास रहे ना रहे, जलता तो इंसान अकेले ही है। फिर कैसा प्यार, कैसा रिश्ता, क्या संपत्ति और क्या पैसा!”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ”कुछ क्षणों के लिये मृत्यु को याद कर तुममें इतना वैराग्य उत्पन्न हो गया। मैं हर समय मृत्यु को याद रखती हूँ।”

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