“प्रभु!”

गुरुदेव के कक्ष के भीतर जाते ही उसके मुँह से बस यह एक शब्द ही निकला। हाथ जोड़ बैठ गया वो उन श्री चरणों में। शब्द अक्सर उसका साथ छोड़ दिया करते थे उसके गुरु के सामने। दोनों एकटक देख रहे थे एक दूसरे की आँखों में। और फैला था घुप्प सन्नाटा! आत्मा से आत्मा की बातें अक्सर मौन की भाषा में होती है।

उसकी नज़र उनकी आँखों से हटकर उनके स्वरुप पर पड़ी। आज गुरुदेव कुछ अलग से लग रहे थे। यूँ तो उनके तेज से पूरा आश्रम ही अहर्निश प्रज्ज्वलित रहता था पर आज उनकी आभा कुछ विचित्र-सी थी। उसने ध्यान से देख तो पाया कि उसकी दृष्टि गुरुदेव की पीठ के पीछे दीवार को साफ़-साफ़ देख पा रही थी। जैसे वेदी पर बैठा जो शरीर दिख रहा था, वो वहाँ था ही नहीं! जैसे उनका शरीर ही कोई मृगतृष्णा है। Mirage.

“क्या यह भी प्रभु की लीला है? खेलना तो स्वभाव है इनका। शायद खेल ही रहे हैं मेरे mind से।”

सोचकर वो मुस्कुरा पड़ा। जो गुरुदेव को जानते थे वो उनके बालपन से वाकिफ थे। सम्पूर्ण ब्रम्हांड का ज्ञान खुद में समाये वह किसी 5 साल के बच्चे जैसे नटखट थे। अपने spiritual children के साथ मस्ती करने में उन्हें हमेशा ही रूचि रही है। ज्ञान भारी बनाता है। आत्मज्ञान हल्का।

“पर हर हलके खेल में कुछ भारी छुपा होता है।”

बड़ी ही सहजता से गुरुदेव ने उसके मन को पढ़ते हुए कहा। सुनकर उसके मन में मानो 1000 मिश्री घुल गई हो! उनका मौन जितना शान्ति देता है उनकी आवाज़ उतना ही रोमांचित कर जाती है। वो दो विपरीत के बीच का समन्वय हैं!   

“तुम्हें जो दिख रहा है उसमें भी कुछ गहरा रहस्य है। तुम अक्सर मन ही मन पूछते थे ना कि प्रभु, आपका असली स्वरुप क्या है।”

वो थोड़ा सिहर उठा। क्या गुरुदेव सच में उसके मन में चल रहे विचारो के साक्षी होते हैं हर पल? कैसे पता उनको कि अकेले में वो क्या कहता है उनसे?

“तुम्हारी दृष्टि जो देख रही है वही मेरा असली स्वरुप है… और तुम्हारा भी।”

उनके मुख से यह शब्द सुन जैसे उसके अंदर कुछ मर-सा गया। मृत्यु-सा वैराग्य तिल-तिलकर उसे किसी गहरे भाव में डुबोने लगा। एक लम्बी सांस छोड़ते हुए उसने कहा,

“नाथ, अब कुछ जानने की आस नहीं बची। जब मैं ही शिव हूँ, मैं ही शव हूँ, तो मंदिर क्या और श्मशान क्या! आज सारे प्रश्न ढह गयें। अब नहीं पाना किसी को।”

“And yet, you must discover yourself, beta.”

“I have discovered you. In you, I have found my everything.”

वो मुस्कुराकर फिर मौन हो गयें।

“संन्यास दे दीजिये, गुरुदेव।”

“ना ना। संन्यास नहीं। विवाह ही असली सन्यास है।”

“प्रभु, विवाह के लायक आपने छोड़ा नहीं है। आत्म-स्वरुप का दर्शन ही क्यों अगर शरीर के पाश में बांधना ही था तो?”

सुनकर गुरुदेव मौन हो गए और उसे अनिमेष देखने लगें, मानो कुछ परख रहे हो उसके भीतर। फिर मुस्कुराकर बोलें,

“ठीक है। तुम अविवाहित रहो। You have my approval.”

उनका गंभीर लहज़ा एकदम से बदल गया और किसी घनिष्ट मित्र के समान मज़ाकिया स्वर में बोल पड़े,

“अब मेरा फैलाया रायता मुझे ही तो समेटना होगा।”

और खिलखिलाकर हस पड़े किसी मासूम बच्चे-से। अगर आपने उनको करीब से जाना है तो आप पाएंगे कि वो हर क्षण रूप बदलते हैं। तरह-तरह के लहज़े में बात करते हैं। वो किसी नैतिकता या सामाजिक बंधन में नहीं बंधे हैं। उनके उसूल स्थिर हैं। मन और बुद्धि स्थिर है। विवेक और आत्मा स्थिर है। पर उनका role स्थिर नहीं है। वो कभी गुरु बनकर आएंगे तो कभी मित्र बनकर आपके इज़्ज़त का maggie बनाकर खा जाएंगे सबके सामने। कभी माँ बन संभालेंगे तो कभी पिता बन अनुशासित करेंगे। आपकी प्रगति के लिए वो आपके इष्ट का स्वरुप ले लेंगे और कभी एक भाई बनकर आपकी हिफाज़त करेंगे। और कभी-कभी यह सारे स्वरुप एक ही पल में एक के बाद एक दिखा देंगे और आपका हाज़मा ही बिगड़ जाएगा!

वो ज़रा उदास हो गया। क्या करेगा लौट कर समाज में? इच्छा के बिना क्या जीवन संभव भी है? उसका मन तो गुरु चरणों में पड़ा रहता है हर वक़्त। कुछ रखा नहीं उसका इस दुनिया में। गुरुदेव क्यों हाथ पकड़कर आध्यात्म के गहरे आयामों पर ले गयें अगर ऐसे डूबता ही छोड़ना था तो?

बच्चे की उदासी माँ बिन कहे जान लेती है।

“संन्यास दिया नहीं जाता। संन्यास घटित होता है। यहां…”

कहकर गुरुदेव ने उसके हृदय पर हाथ रखा। अचानक मानो एक बिजली सी दौड़ गयी उसके शरीर में। मानो सारा बोझ उतर गया हो। वो बुत्त बना गुरुदेव की ओर देख रहा था। प्रभु की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गयी। उनके मुख का भाव परिवर्तित हो गया। आखों में अदम्य साहस और तेज था। गुरुदेव की दृष्टि मानो उसे अंदर तक चीरकर निकल जा रही थी। पर उसे डर नहीं लगा। उसे पता था कि वो जिनके साथ है उनके साथ वो सबसे ज़्यादा सुरक्षित है। गुरुदेव अक्सर कहा करते थे,

“Until I am here, no power in the three worlds can touch my child.”

धीरे-धीरे सब शांत हो गया। भीतर भी और बाहर भी। गुरुदेव उसके अनाहत चक्र से हाथ हटाकर बोलें,

“वैसे ही इतने आवरण पड़े हुए हैं इस चेतना पर। गेरुआ वस्त्र का एक और आवरण क्यों! मैं तुम्हें वस्त्रों की बेड़ियों में नहीं बांधना चाहता। बाँधने नहीं, बंधनों से मुक्ति दिलाने आया हूँ। Ochre is the colour of devotion, of surrender, just like Mira loved Girdhar Gopal. This is the path of transformation. Only the dye of devotion will wash off the various colours of grief, desires and pain I see in you. It’s the colour of the rising sun, of the setting sun; it’s the colour of fire. All your afflictions will burn and the real you will shine forth. It’ll take time, but it’ll happen. आत्मा को गेरुआ रँगो। चेतना को गेरुआ रँगो। वस्त्रों को अपने रास्ते का काँटा मत बनने दो।”

कुछ देर शांत हो गुरुदेव ने अपनी आँखें बंद कर ली। वो बैठकर आत्मसात करने की असफल कोशिश कर रहा था उनके श्री मुख से निकले वचनो को। गहरी सांस छोड़ते हुए गुरुदेव ने कहा,

“संन्यास नहीं दे रहा हूँ। संन्यास दिया नहीं जाता। वो घटित होता है। But you are a sanyasi from today. Go and serve the world and give up your life in service.”

वो शांत हो गया। ना कुछ कहने को बाकी था ना ही सुनने को। उसने गुरुदेव के चरणों में अपना सर रख दिया। बहुत ही प्यार से प्रभु ने अपना वरद हस्त उसके माथे के पीछे रखा। उस एक क्षण में उसके रोम-रोम को यह आभास हो गया कि इस ब्रम्हांड की कोई शक्ति उसे नहीं छू पाएगी। ब्रम्हांड के अधिपति का हाथ उसके सर पर पड़ गया।

“कोई आदेश, प्रभु?”

“Just take care of yourself . Don’t abuse your body. और थोड़ी बहुत देवी की साधना करते रहना। Everything else will fall into its place.”

आँखों को हल्का बंद करते हुए उन्होंने कहा,

“मेरे बाकी सभी निर्देश तुम्हें मौन में मिल जाएंगे जैसे आजतक मिले हैं।”

आजतक सच में कई बार जब वो एकांत में होता था तो उसे आभास होता था जैसे मानो गुरुदेव उसे किसी कार्य के प्रति सजग कर रहे हों या किसी व्यक्ति के प्रति सचेत कर रहे हों। उसके ज़्यादा मित्र नहीं थे। सब कहा करते थे कि वो बहुत अकेला है ज़िन्दगी में। पर सच्चाई सिर्फ उसकी आत्मा जानती थी। उसे हर क्षण गुरुदेव का आभास होता था। उसके हर प्रश्न हर दुविधा का हल किसी न किसी माध्यम से उस तक पहुंचाया गया है आजतक- कभी स्वप्न में तो कभी जागृत अवस्था में। पर उसे लगता था कि उसके मन का भ्रम है। एक सिद्ध क्यों भला एक पापी के पास आएंगे। मेल ही नहीं था उसमे और गुरुदेव में। पर आज उसकी इस दुविधा का उत्तर ही उसके सामने रख दिया गया। हर खामोशी में गुरुदेव ही उससे बात करते आये हैं।

एक बच्चो-सी मुस्कान उसके चेहरे पर छा गयी। उसने आँखें मूंदे गुरुदेव को देखकर कहा,

“I love you!”

बिना आँखें खोले प्रभु मुस्कुराते हुए बोलें,

“I know.”

थोड़ा रूठकर उसने मन ही मन कहा,

‘I know’ कौन बोलता है! कभी तो ‘I love you, too, beta’ बोला कीजिये! शायद मैं ही लायक नहीं हूँ अभी।”

तभी सहसा एक आवाज़ पड़ी उसके कानो में। गुरुदेव ने कहा,

“I don’t say. I just do.”

और वो ध्यान में चले गयें।

वो गुरुदेव को प्रणाम कर कमरे से बाहर निकल आया। उसके वस्त्र अब भी वही थे जो वह पहनकर भीतर गया था। अकेला गया था और अकेला ही वापस आया। दुनिया को तो यही दिखा। पर सच किसी की आँख ना देख पाई। दुनिया की नज़र में सब वही था पर उसका पूरा नज़रिया ही बदल गया था।

भीतर एक सांसारिक व्यक्ति गया था और लौटकर आया एक सन्यासी। उसकी आत्मा ताज़ा-ताज़ा गेरुआ वस्त्र पहने हुए थी।

अंदर गया था एक अकेला इंसान और जब वह बाहर आया तो उसके साथ चल रही थी ब्रम्हांड की सबसे शक्तिशाली ऊर्जा – “श्री-नारायण।”

#समर्पित

Author’s note: 

Dearest os.me family, since I have been getting a lot of personal messages from my lovely spiritual tribe asking me the same question,  I am putting this note here.

This is a work of fiction based on facts; imagination based on not one but many many realities. It may or may not have any association with my personal meeting with Swamiji. 

Whether it has any tinge of my own experiences or not; of all the realities on which the work is based, whether my own reality is included or not, these I leave upto the readers’ interpretation. 

I just have one request. Kindly don’t put my emotion at that high pedestal of Devotion. My karmas are not completely  aligned with His teachings. Many a times, my mind entertain negative and destructive thoughts. No matter how hard I try, at times,  I end up shouting on people. At times, I am not alert enough to realise if someone needs me. In all, I am yet not a devotee. My conduct is still not at par with how He wants His kids to be. And our scriptures say, Shivo Bhootvaa Shivam Yajet. Only when you become Shiva (or Narayan or Guru)  can you truly worship Him. Hence, I am humbled by your love and appreciation. But I am not a devotee. Please 🙂

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Snigdha

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