ऋषिकेश की पहाड़ी वादियां और आज शाम कुछ ज्यादा ही गहरी हो गई थी,28मार्च की संध्या थी और मै राम झूला पार कर त्रिवेणी घाट चला गया।वहां एक साथ पहाड़ों,नदियों,और भव्य मन्दिरों के दर्शन कर वापिस उसी रास्ते आ रहा था तो यकायक मेरी नजर सड़क के किनारे स्कूटी पर पशु का चारा और बॉटल में दूध लिए एक विदेशी लड़की पर गई जो एक लावारिश बछड़े को अपनी स्कूटी पर बोरी में रखा हरा चारा खिला रही थी और प्यार से उसके गर्दन पर हाथ फेर रही थी। मै यह देखकर स्तब्ध रह गया कि लोग वेस्टर्न कल्चर वाले लोगो के बारे में सिर्फ एक ही तरह की मानसिकता रखते हैं पर यहां तो कुछ अलग ही नजारा था।
यह दृश्य देखकर मै बहुत अभिभूत हुआ और मन किया कि ये पिक क्लिक कर लूं और उसके सामने हमने उनकी पिक क्लिक कर ली ताकि मुझे एक प्रेरणा मिलती रहे।पर जैसे ही हमने पिक क्लिक की वो जोड़ से चिल्लाई,,,, Delete this picture, l don’t want any type of appreciation.. delete it,,, delete it,,,,,,, हमने कहा l am inspired of your opinions, you are doing a great job….लेकिन वो चाहती थी कि उसके इस नेक काम की कोई मनुष्य तारीफ ना करे शायद इसलिए वो स्कूटी से नीचे उतरी मेरा फ़ोन मांगा और गेलरी से वो फोटो डिलीट कर दिया।हमने उसे हाथ जोड़ कर प्रणाम किया ।सोचा हमलोग अगर एक दिन गंगा स्नान कर लें तो दर्जनों सेल्फी लेते हैं ताकि लोग हमारी तारीफ करें और एक वो जो हर रोज स्कूटी पर दूध की बॉटल और चारा लेकर निकलती है और लावारिश पशुओं के बच्चों को हार्दिक प्रेम के साथ चारा और दूध डालती है।वो भारत की नहीं पर भारत की संस्कृति उसके अंदर है।
अब जरा हम अपने भारतीय लोगो के ऊपर भी नजर डालें।इसी ऋषिकेश में रोज हजारों विदेशी योग,अध्यात्म,मेडिटेशन इत्यादि सीखने आते हैं।हमने खुद अमेरिकन सन्यासी से बात की है वो कितना हमारे संस्कृति का सम्मान करते हैं।लेकिन इसी गंगा के किनारे जब दिल्ली के लडके लड़कियों को हजारों की संख्या में अश्लील हरकतें करते देखता हूं तो सोच में पड़ जाता हूं कि ये कैसे भारतीय हैं जिनके अंदर भारतीयता नाम की चीज नहीं।अध्यात्म शून्य जीवन जी रहे सब।कोई सन्यासी या साधु नदी किनारे बैठकर ध्यान कर रहा और ये लोग उसी जगह बिना कुछ सोचे समझे अश्लील हरकत करते रहते हैं।मतलब योग नगरी ऋषिकेश में गंगा किनारे गोवा बीच जैसा नजारा देखने को मिलता है।अब जरा विचार करना है कि वैस्टर्न लोगों ने जहां जीवन के सार को समझने की सोच जागृत की तो वो भारतीयों के रंग में रंगने लगे और भारतीयों ने एडवांस होने की एक ही तकरीब निकाली,,,अधिक से अधिक वासनात्मक बनो ,,,,बस इतना ही सीखा। हर जगह ये पहाड़ों में प्लास्टिक,चिप्स के पैकेट,शराब और कोल्ड ड्रिंक्स की बॉटल फेंक कर प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते और सनातन धर्म का उपहास करते नजर आते हैं ।ये वही दिल्ली वाले लोग हैं जो अत्यंत ही शिक्षित और एडवांस माने जाते हैं।इनके लिए अध्यात्म,संस्कार,तीर्थ की मर्यादा इत्यादि कोई मायने नहीं रखती।बस इन्हे अपनी वासनाओं की पूर्ति करना है इसके लिए ये गंगा के पवित्र तट को गोआ का तट बनाने से नहीं चूकते।मेरी बात में अगर किसी को झूठ नजर आए तो यहां रहकर कोई भी इन दृश्यों को देखकर समझ सकता है।कोई भी इन स्वार्थी और
केवलअपने ही व्यक्तिगत स्वार्थ के निमित्त जीने वाले युवाओं से कैसे देश और धर्म की रक्षा या संवर्धन की उम्मीद कर सकता है।सोचना आवश्यक है क्यों कि यही हमारे देश के भावी नेता भी तो होंगे।

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Ashu Harivanshi

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