हे प्रभु! कैसा वो बलिदान हो जिससे मेरी करुणा बचा रहे ?

कैसा वो अर्पण हो जिसमें निज ब्याकुलता न शेष रहे?

निज प्राण देकर क्या मैं सिद्ध कहलायुंगा ?
या फिर राजा शिवि की भांति दानवान हो जाऊंगा?

शीश कटाकर जिसने न्योछावर किये प्राण ,
वे उनके मूर्ति से विभूषित कर रहे हर ज़रूरत के रिक्त स्थान!

ज्ञान बनकर जिसने दीप्तमान किया जग को,
व्यापार करके मलिन किया उन्होंने उनके पग को ,

कोई मांगता प्रमाण उनके साख्य का, तो कोई यूँही झुटला देता
कोई कहते उनको पृथक और अकारण अभिशप्त मानवता का,

कोई कहता उनको प्रकृति की नियमित माया बताकर सांख्य योग,
कोई समझाते गति के नियम, तारतम्य और संख्या योग !

इस रण में कौन सी जीत श्रेयकर होगा?
यही पूछना मेरे अहम् का आज दुर्बाध्य समर होगा!

फिर मिट जाने दो प्रभु !मेरी अकारण इच्छा अभिलाषा को ,

प्रकृति के तारतम्य में शायद श्रेयकर न कहलायुंगा !
लोगो के अनुमोदन, जयमाला से वंचित रह जायूँगा !

कर्मयोग भी जिसने साधा , पूछो उसने क्या प्राप्त किये ?
कैसे कैसे कटाक्ष सहे, कैसे फिर भी स्थितप्रज्ञ रहे ?

फिर भी  वे स्थितप्रज्ञ रहे!

धन्यवाद,

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Aarindm

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