संत ज्ञानेश्वर अवतार के २५० वर्षों बाद संत एकनाथ महाराज जीं का जन्म पैठण गांव में खानदानी देशस्थ ब्राह्मण के घर हुआ । उनके पिता का नाम सूर्यनारायण और माता का नाम रूक्मिणी था । एकनाथ जीं के बचपन मे़ं हि उनके माता पिता का देहांत हो गया । इसिलिए उनका लालन पालन उनके दादाजी चक्रपाणी जीं ने किया । एकनाथ जी अध्यात्मिक वृत्ती के थे । वेदांत में पारंगत थे । छः साल की उम्र में हि वे अपने गुरू की खोज में निकले । संत जनार्दन स्वामी जी ने एकनाथ जीं को दिक्षा दि । वे उनके गुरू थे । उन्होंने अपने गुरू की अनन्य भाव से सेवा की । जनार्दन स्वामी दत्तभक्त थे । अपने शिष्य की सेवा से प्रसन्न होकर उन्होंने एकनाथ जीं को दत्तदर्शन करवाया । अपने गुरू के आशिर्वाद से उन्हें अध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ती हुयी ।

गुरू का वर्णन करने के लिए वे गुरू को ओंकार स्वरूप , सद्गुरू समर्थ , अनाथों के नाथ मानकर उनको नमन करते है । गुरू उनके मायबाप है । गुरुकृपा से माया मोह के बंधन टूट जाते है । मेरे मन का मोहजाल सद्गुरू के अतिरिक्त कौन दूर कर सकता है ? ऐसा प्रश्न वे पुछते है । सद्गुरू आनंद सागर है । त्रैलोक्य के आधार है । गुरू स्वयंप्रकाशित है । जिनके ज्ञान प्रकाश के आगे चंद्र , सूर्य , अग्नी आदि तेजोहिन है । गुरू परब्रह्म है । उनका नाम सदैव अंतरआत्मा में जागृत है । गुरू वंदनीय है । एकनाथ जीं अपने गुरू की स्तुती करके उन्हें बारंबार नमन करते है ।

ओंकार स्वरूपा, सद्गुरु समर्था,
अनाथाच्या नाथा, तुज नमो,
तुज नमो, तुज नमो, तुज नमो ।

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

नमो मायबापा, गुरुकृपाघना,
तोडी या बंधना मायामोहा,
मोहोजाल माझे कोण नीरशील,
तुजविण दयाळा सद्गुरुराया ।

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

सद्गुरुराया माझा आनंदसागर,
त्रैलोक्या आधार गुरुराव,
गुरुराव स्वामी असे स्वयंप्रकाश,
ज्या पुढे उदास चंद्र रवी,
रवी, शशी, अग्नि, नेणती ज्या रुपा,
स्वप्रकाशरुपा नेणे वेद ।

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

एका जनार्दनी, गुरुपरब्रम्ह,
तयाचे पै नाम सदा मुखी,
तुज नमो, तुज नमो, तुज नमो ।

– संत एकनाथ

गुरू आज्ञानुसार एकनाथ जीं ने गृहस्थाश्रम स्वीकारा । उनकी पत्नी का नाम गिरीजाबाई था । एक बार एकनाथ जीं के पिता का श्राध्द था । वे महाद्वार पर श्राध्द भोजन के लिए ब्राम्हणों की प्रतिक्षा कर रहे थे । उनकी पत्नी ने सारा स्वयंपाक सिध्द किया । उनके घर के पास से गुजर रहे तीन चार शूद्र जाती के लोगों को भोजन का सुवास आया । वे उस भोजन की स्तुती करने लगे और एक दुसरे से भोजन प्राप्ती के विषय में बातें करने लगे । उनकी बातें सुनकर एकनाथ जीं ने श्राध्द का सारा भोजन उन शूद्रों को दिया । जब यह बात ब्राम्हणों को पता चली तो उन्होंने एकनाथ जीं के घर श्राद्ध का भोजन करना अस्वीकार किया । उनकी पत्नी ने शुचिर्भूत होकर फिर से सारा स्वयंपाक बनाया । फिर भी ब्राह्मण उनके घर नहिं गये । श्राध्द विधी पूरा करने के लिए एकनाथ जीं ने साक्षात पितरों को हि भूलोक पर बुलाकर उन्हें भोजन करवाया ।

एकनाथ जीं ने शिव मंदिर में पाषाण के नंदि को सजीव करके अपने हाथों से उसे चारा खिलाया था । श्रीकृष्ण भगवान १२ वर्षों तक श्रीखंड्या नाम के नोकर के रूप में उनके घर पानी भर रहे थे । कहते है , एकनाथ जीं के घर साक्षात दत्तप्रभू द्वारपाल का काम करते थे । एक बार जब वे तीर्थयात्रा करके लौट रहे थे , तो उन्हें एक गधा पानी के लिए तडपता हुआ दिखाई दिया । उन्होंने तीर्थयात्रा से लाया गंगाजल उस गधे के मुख में डालकर उसकी तृष्णा शांत की ।

एक प्रसंग ऐसा है , जिससे एकनाथ जीं के शांत और परोपकारी स्वभाव का दर्शन होता है । एक बार जब वे स्नान करने जा रहे थे , तब उनका अपमान करने हेतु एक यवन उनके उपर बार बार थुक रहा था । जितनी बार वो थुकता उतनी बार एकनाथ जी फिर से स्नान करके आते । वे उस यवन से कुछ नहिं बोले । अंत में वो यवन अपने निंदनीय कृत्य से लज्जित हो गया । उसने एकनाथ जीं की क्षमा मांगी । एकनाथ जीं उससे बोले ,“तुम क्यों दुखी हो रहे हो? तुम्हारा मुझपर बहुत एहसान है । रोज मैं एक हि बार स्नान करके पूजा करता हूं । आज तुम्हारे कारण मुझे इतनी बार स्नान करके पूजा करने का भाग्य मिला । मैं तुम्हारा आभारी हूं ।”

संत एकनाथ जीं ने मराठी भाषा में भारूड , जोगवा , गवळणी , गोंधळ , हरीपाठ , रूक्मिणी स्वयंवर , आनंदलहरी आदि काव्य साहित्य से समाज में जनजागृती की । वे एक लोकप्रिय संत कवी थे । स्वयं का उल्लेख वे ‘एका जनार्दनी’ नाम से करते । जब उन्हें दत्तदर्शन हुआ तो उन्होंने श्री दत्तात्रेय जीं की आरती लिखी । “त्रिगुणात्मक त्रिमूर्ती दत्त हा जाणा । त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्य राणा ।।” उनका ‘एकनाथी भागवत’ ग्रंथ अत्यंत लोकप्रिय है । लोग इस ग्रंथ के पारायण करते है । ऐसे महान संत एकनाथ महाराज जीं को मेरा प्रणाम 🙏

आवडीनें भावें हरिनाम घेसी ।
तुझी चिंता त्यासी सर्व आहे ॥१॥

नको खेद करूं कोणत्या गोष्टीचा ।
पति तो लक्ष्मीचा जाणतसे ॥२॥

सकळ जीवांचा करितो सांभाळ ।
तुज मोकलील ऐसें नाहीं ॥३॥

जैसी स्थिति आहे तैशापरी राहें ।
कौतुक तूं पाहें संचिताचें ॥४॥

एका जनार्दनी भोग प्रारब्धाचा ।
हरिकृपें त्याचा नाश आहे ॥५॥

– संत एकनाथ

भावार्थ : प्रेम से हरी का नाम लिजिये । उसे आपकी सारी चिंता है । किसी भी बात का खेद मत किजिए । लक्ष्मी के पती सब जानते है । जो सारे जीवों के रक्षक है वे आपको अवश्य संभालेंगे । संचित कर्मों के अनुसार जिस परीस्थिती में है उसमें आनंद मानकर जीवन जीना चाहिए । हरिकृपा से प्रारब्ध के भोग समाप्त होते है ।

sant eknath maharaj – संत एकनाथ महाराज