इतर विठ्ठल भक्त स्त्रियों से संत कान्होपात्रा का जीवन पूर्णतः भिन्न था । शामा नाम की अतिशय धनवान , रूपसंपन्न गणिका के घर उनका जन्म हुआ । ऐषोआराम और सुखोपभोगी वातावरण में वो पली बडि । वहां विठ्ठल भक्ती की परंपरा केवल अशक्य थी । वेश्या कुल की स्त्री को कौन गुरू? किंतु कान्होपात्रा परमार्थ के मार्ग पर निकली । भक्ती का अंकुर उसके ह्रदय में फुट गया । कान्होपात्रा रूपवान , बुध्दिमान थी । वह गायन और नृत्य में निपुण थी । उसके सौंदर्य की चर्चा दूरदूर तक थी । कान्होपात्रा गणिका का व्यवसाय आगे चलाएं ऐसी उसके मां की ईच्छा थी । किंतु कान्होपात्रा को यह मंजूर नहिं था ।

मंगलवेढा गांव के सदाशिव मालगुजर व्यक्ती की नजर कान्होपात्रा पर पडि और वो उसे गणिका के रूप में प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लगा । इस संकट से कान्होपात्रा घबरायी नहिं । वो ईश्वर के सामने हाथ जोडकर जप करने लगी । रातभर वो जप करती रहि । सुबह के समय भजन की आवाज से वो उठ गयी । वारकरी लोगों का एक समुह आषाढी एकादशी निमित्त भजन गात गात पंढरपूर जा रहा था । उसी वक्त मन का अस्पष्ट विचार उसने पक्का किया । उसकी बुढि दासी हौसा वारकरी थी । हौसा की मदत से वो उन भक्तों के साथ पंढरपूर चली गयी । विठ्ठल चरणों पर समर्पित होकर उसने विठ्ठल का दास्यत्व स्वीकार किया । कान्होपात्रा स्वरचित अभंग गाने लगी । विठ्ठल भक्ती में वो पूरी तरह मग्न हो गयी ।

इस ओर सदाशिव मालगुजर ने कान्होपात्रा के बारे में बादशहा को बताया और उसे वापस लाकर जनानखाना में दाखल करने के लिए उद्युक्त किया । बादशहा के शिपाई कान्होपात्रा को बंदि बनाने के लिए पंढरपूर आ गये । कान्होपात्रा ने विठ्ठल का नामस्मरण करते करते विठ्ठल चरणों पर अपने प्राणों को त्याग दिया । अपनी उत्कट भक्ती से चराचर चैतन्य में एकरूप हो गयी ।

गुरू नहिं , कोई परंपरा नहिं , अध्यात्मिक वातावरण नहिं ऐसी परीस्थिती में केवल अपनी भक्ती से कान्होपात्रा संत कान्होपात्रा के पद पहुंची । इसिलिए वह अद्वितीय है । संत कान्होपात्रा जीं को मेरा प्रणाम 🙏

नको देवराया अंत आता पाहू ।
प्राण हा सर्वथा जाऊ पाहे ।।१।।

हरिणीचे पाडस व्याघ्रे धरियेले ।
मजलागी जाहले तैसे देवा ।। २ ।।

तुजवीण ठाव न दिसे त्रिभुवनी ।
धावे हो जननी विठाबाई ।।३।।

मोकलोनी आस जाहले उदास ।
घेई कान्होपात्रेस हृदयात ।।४।।

– संत कान्होपात्रा

भावार्थ : हे प्रभो , अब अंत मत देखिए । मेरे प्राण शरीर को त्याग रहे है । हिरण का बछडा व्याघ्र पकडता है तब उसकी जो अवस्था होती है , मेरी अवस्था वैसी हो गयी है । आप के बिना त्रिभुवन में दुसरे किसी का मुझे स्मरण नहिं हो रहा । ओ मेरी जननी विठाबाई मेरी मदत में अब बिलंब ना किजिए । आपको पुकारते पुकारते मैं थक गयी हूं । मुझे अंततः अपने ह्रदय में लिजिये ।

संत कान्होपात्रा माहिती