श्री संत निलोबा जी घोडनदि के किनारे प्रभू रामचंद्र जीं ने स्थापन किये रामलिंग के निस्सीम उपासक थे । कुलकर्णी वतन उनके पास था । किंतू पूजा में कुलकर्णी वतन व्यत्यय आ रहा था । इसिलिए उन्होंने वतन जहागिरदारी छोड दि । पूजा अर्चा , पंढरपूर की वारी , नामस्मरण में वे तल्लीन हो गये । वे नियमित वारी करने लगे । उनकी पत्नी सौ. मैनाबाई उनके साथ पैदल वारी करने लगी ।

इस समय संत तुकाराम महाराज जीं के चिरंजीव नारायण महाराज जीं से निलोबा जीं का संपर्क हुआ । नारायण महाराज जीं से तुकाराम जीं का चरीत्र उन्हें सुनने को मिला । निलोबा जी इससे बहुत प्रभावित हो गये । तुकाराम जीं को सद्गुरू रूप में प्राप्त करे ऐसा उन्हें लगने लगा । उन्होंने तुकाराम जीं का ध्यास लिया । उनके स्मरण में हमेशा तुकाराम जी थे । तुकाराम जीं के दर्शन के लिए वे व्याकुल रहते । वे कहते है ,

तुका ध्यानी, तुका मनी ।
तुका दिसे जनी वनी ।।
तुका तुका म्हणोनी ।
निशिदिनी बोलावे ।।

भावार्थ : तुकाराम जी मेरे ध्यान में , मन में है । हर तरफ मुझे वहि दिखते है । तुका तुका कहकर मैं उन्हें दिन रात पुकारता हूं ।

उनके आप्त व्यक्तीयों ने उनसे बारबार कहा कि , तुकाराम जी सदेह वैकुंठ चले गये है । वे अब नहिं आ सकते । किंतु निलोबा जी ने अन्न पाणी व्यर्ज कर दिया । उपवास करके वे तपश्चर्या करने लगे । वे ४२ दिनों तक निराहार रहकर तुकाराम जीं का अखंड जप कर रहे थे । श्रीहरी विठ्ठल को दया आकर उन्होंने निलोबा जी को दर्शन दिये । विठ्ठल बोले ,“निलोबा उठो , मैं आ गया हूं । जो चाहते हो वो मांग लो ।“ निलोबा जीं ने आंखे खोलके देखा तो प्रत्यक्ष पांडुरंग उनके सामने थे । किंतु निलोबा जीं ने विठ्ठल से कहा ,“प्रभू , मैंने आपको बुलाया नहिं । फिर आप क्यों आ गये ? मैं तो मेरे गुरू संत तुकाराम जीं से मिलने के लिए व्याकुल हूं । मुझे उनकी प्रतिक्षा है ।” वे कहते है ,

तेव्हा तु परत जा, येथे तुजलागी बोलविले ।
प्रार्थिल्याबाचोनी आलासी का ? ।।

प्रल्हादाकैवारी दैत्याची दंवाया ।
स्तंभी देवराया प्रकटोनी ।।

तैशापरी मज नाही बा संकट ।
तरी का फुकट श्रम केला ? ।।

निळा म्हणे आम्ही नोळखुची देवा ।
तुक्याचा धावा करीतसे ।।

भावार्थ : हे प्रभो , मैंने आपको बुलाया नहिं । आप आने के लिए प्रार्थना कि नहिं । इसिलिए आप वापस लौट जाईये । प्रल्हाद जैसे मैं किसी बडे संकट में नहिं हूं । आपने यहां आने का व्यर्थ श्रम क्यों किया ? मैं आपको जानता नहिं । मैं तुकाराम जीं को मिलने के लिये उनका नामस्मरण कर रहा हूं ।

ऐसे खडे बोल सुनकर विठ्ठल अचंबित हो गये । निलोबा जीं की प्रखर गुरूनिष्ठा देखकर विठ्ठल वापस चले गये । विठ्ठल ने तुकाराम जीं से कहा ,“आप को पुन्हा मृत्यूलोक में जाकर निलोबा जीं को अनुग्रह देना चाहिए ।” तुकाराम जीं ने मृत्यूलोक में आकर निलोबा जीं को उठाया और मस्तक पर हाथ रखकर उन्हें अनुग्रह दिया । तुकाराम जीं से अनुग्रह प्राप्त होने के पश्चात निलोबाराय जीं ने अनेक काव्यग्रंथों का निर्माण किया ।

निलोबा जीं ने विठ्ठल से प्रार्थना की , “आप मेरे गांव पिंपलनेरी आईये । मैं यहि पर आपकी सेवा करना चाहता हूं ।” निलोबा जीं के भक्ती से प्रसन्न होकर विठ्ठल भीमा नदि के तट विठ्ठलवाडी पानी के डोह में मूर्ती रूप आ गये । निलोबा जीं ने डोह से विठ्ठल रूक्मिणी मूर्ती बाहर निकाली । उनकी मंदिर में प्राणप्रतिष्ठा की । इस तरह से वो क्षेत्र प्रति पंढरपूर नाम से विख्यात हुआ । वहां विठ्ठल रूक्मिणी की स्वयंभू मूर्ती है ।

एकनिष्ठ गुरू भक्त श्री निलोबा जीं को मेरा प्रणाम 🙏

संत निळोबाराय महाराज