संत बहिणाबाई जीं को बचपन से हि परमार्थ और भक्ती की ओढ थी । कथा , किर्तन , पुराण श्रवण और सत्पुरुषों की सेवा में उन्हें आनंद आता । पांच वर्ष की आयु में हि उनका विवाह हो गया । उनकी सांसारीक आसक्ती कम होकर पारमार्थिक व्रुत्ती बढने लगी । घर की गरीबी , शिक्षण का अभाव था । फिर भी समाधानी व्रुत्ती और पांडुरंग (श्रीहरी) के प्रति ओढ मन में थी । अखंड नामस्मरण उनके मन में चलता रहता । खेत में काम करते समय भी यह भक्तीभाव अभंग के रूप में उनके मुख से निकलता ।

आगे कोल्हापूर नगर में वास्तव्य के दौरान जयराम स्वामी जीं के कथा किर्तन का प्रभाव बहिणाबाई जीं के मन पर पडा । वह रोज तुकाराम जीं के अभंग गाने लगी । उन्होंने तुकाराम जीं के दर्शन का ध्यास लिया । उन्हें तुकाराम जीं को सद्गुरू करके उनका अनुग्रह एवं आशिर्वाद लेना था । इसिलिए दिन रात तुकाराम जीं के भजन गाकर उनका ध्यान करने लगी । बहिणाबाईं की निष्ठा देखकर तुकाराम जीं ने स्वप्न में आकर उनको साक्षात दर्शन व गुरूपदेश दिया । बहिणाबाईं का पूरा जीवन गुरू उपदेश से बदल गया ।

बहिणाबाई जीं को उनके पूर्व बारह जन्मों का स्मरण था । तेरहवा जन्म स्त्री का मतलब बहिणाबाई का था । संत बहिणाबाई जीं ने अपने बारह जन्म पस्तीस अभंग के रूप में अपने पुत्र को बताये ।

उनके जीवन का एक प्रसंग ऐसा है , एक बार नित्य नियम से वह एकादशी वारी के लिए पंढरपूर जा रहि थी । उन्हें अचानक ठंड लगकर बुखार आया । किंतु पांडुरंग से मिलने की उनकी इतकी तीव्र ईच्छा थी की उन्होंने अपने शरीर पर जो फटि चादर थी उससे विनंती की ,“मेरी ठंड तुम अपने पास रखना । मैं अपनी वारी पूरी करके आती हूं फिर अपना भोग स्विकारती हूं ।” वो चादर उन्होंने वहि पेड पर रखी और चली गयी । वह सुखरूप वापस आने तक वह पेड ठंड लगने जैसा कांप रहा था ।

संत बहिणाबाई जीं ने अपने गुरू को शरण जाकर परमार्थ प्राप्ती कर ली । ऐसे महान संत को मेरा प्रणाम 🙏

संचितासी दग्ध करी ऐसा कोण ।
सद्‌गुरुवांचोन जाण मना ॥ १ ॥

यालागीं सद्‌गुरु असावा उत्तम ।
जेणें निमे श्रम संसाराचा ॥ २ ॥

त्रिविध तापासी कोण करी शांत ।
सद्‌गुरु एकान्त न जोडतां ॥ ३ ॥

जन्ममरणाची कथा कैं निवारे ।
सद्‌गुरु निर्धारें न भेटतां ॥ ४ ॥

वासना निःशेष निवारेल तेव्हां ।
भेटेल तुकोबा सद्‍गुरु तो ॥ ५ ॥

बहिणी म्हणे माझा जाऊं पाहे जीव ।
का हो न ये कींव तुकोबा ॥ ६ ॥

– संत बहिणाबाई

भावार्थ : संचित कर्मों को दग्ध करे ऐसा सद्गुरू बिना अन्य कोई नहिं । इसिलिए सद्गुरू उत्तम हो जिनके सत्संग से संसार का श्रम निवारे । सद्गुरू संग न जोडके त्रिविध ताप कैसे शांत हो सकते है ? सद्गुरू बिना जन्म मरण के बंधन से मुक्त नहिं हो सकते । वासनाओं का निश्चित क्षय होगा जब तुकाराम जीं को सद्गुरू रूप में प्राप्त करू । बहिणाबाई बोल रहि है तुकाराम जीं को मेरी दया क्यों नहिं आ रहि ? उनके लिए मेरे प्राण कासाविस हो रहे है ।

संत बहिणाबाई माहिती