संत भानुदास जी संत एकनाथ महाराज जीं के पितामह (परदादा) थे । उनका कपडों का व्यापार था । उन्होंने बचपन में हि सारा अध्ययन पूरा किया । ईश्वर प्राप्ती के लिए ध्यानधारणा की । सूर्य नारायण की उपासना की । उनकी तपस्या देखकर सूर्य नारायण ने एक ब्राह्मण के रूप में उन्हें दर्शन दिया था । समाज के राजकीय , सामाजिक एवं धार्मिक अव्यवस्था का उन्होंने निरीक्षण किया । उनकी सत्यनिष्ठता , निर्भयता और प्रभावशाली व्यक्तिमत्व की ख्याती दूरदूर तक फैली । वे एक थोर किर्तनकार थे । अपने किर्तन और ग्रंथ साहित्य से भानुदास जीं ने समाज में जाग्रीतता निर्माण की । उस समय अनेक परकीय आक्रमणों के कारण समाज की स्थिती दयनीय थी । उन्होंने समाज सुधारक का कार्य किया । विजयनगर का राजा कृष्‍णराय विठ्ठल मूर्ती पंढरपूर से अपने राज्य ले गया । भानुदास जी प्रयत्न पूर्वक मूर्ती वापस पंढरपूर लेकर आये ।

भानुदास जीं ने अनेक ग्रंथ लिखे । उनके अद्वैत , विठ्ठल माहात्म्य , करूणा , नाममहिमा , बालक्रिडा , मुमुक्षूसबोध आदि साहित्य उपलब्ध है । उनकी संत भानुदास गाथा लोकप्रिय है । उन्होंने समाज प्रबोधन का काम किया । श्री संत भानुदास जीं के कार्य को मेरा प्रणाम 🙏

भवसिंधू तरावया सोपें हे वर्म ।
मुखीं तो श्रीराम जप सदा ॥१॥

यमाची यातना न घडे बंधन ।
तुटेल हें जाणा कर्माकर्म ॥२॥

योग याग तपें घडती तीर्थाटन ।
मुखीं गातां नारायण जोडे सर्व ॥३॥

भानुदास म्हणे कलिमाजी सोपें ।
नामस्मरण जपे श्रीविठ्ठलाचें ॥४॥

– संत भानुदास

भावार्थ : राम नाम का जप निरंतर करने से भवसागर को पार कर सकते है । रामनाम जप से कर्म बंधन से मुक्ती मिलेगी । काल का भय नहिं रहेगा । केवल राम नाम के जप से योग तप तीर्थाटन का पुण्य प्राप्त होता है । भानुदास बता रहा है , कलियुग में परमार्थ प्राप्ती के लिए रामनाम जप सबसे सरल उपाय है ।

संत भानुदास