घर के आँगन में खड़ा वह बड़ा-सा पीपल।
आज ज़रा खुशनुमा-सा है।
उसके शाखों पर करीने से नन्ही कोपलें निकली हैं।
मखमल में लिपटी पिघले पन्नों सी हरी।
किसी नवजात की अधखुली आँखों से अंगराई लेती हैं,
और पीपल एक नयी माँ-सा रह-रह कर सुन्हरा हो जाता है।

बड़ी ही जतन से पालता है उन्हें–

आँधियों में उसका कलेजा उन पत्तों के साथ ही इधर-उधर झूलने लग जाता है मृत्यु की बाहें पकड़ कर।
दिल दहलाती हुई एक सिहरन
पीपल के सारे बदन पर फैल जाती है,
और माँ का दिल लिए बैठे उस पीपल का पूरा अस्तित्व अपने पत्तो के साथ सरसराने लग जाता है।

बारिश की पहली बूँदें जब उन पत्तों पर पड़ती हैं,
तो पीपल भी किसी बावली हवा- सा उन पत्तों के साथ नाचने लगता है।

ज्येष्ठ की भरी दोपहरी में खप्पर-से तपते आसमान के नीचे, वो पीपल इसी इंतज़ार में रहता है कि कब शाम होगी और सूरज का दम्भ क्षितिज पर पिघल जाएगा।

फिर हवाओं के साथ लोरी गुनगुनाकर पीपल अपने पत्तों को रात के आँचल में यूँहि सुला देता है, एक नए भोर की आस में…

फिर मौसम बदला।

पतझड़ आया। सरदी बढ़ने लगी।

एक-एक कर उसके पत्ते पीपल की उंगलियां छोड़ मिट्टी के संग उड़ गएँ।
और पीपल एक टक खड़ा रहा मन में अनंत प्रेम समाये।

तूफ़ान में मौत की आगोश में झूलता डर और बारिश की फुहार में नाचती ख़ुशी यादों से होती हुई शून्य में खो गयी।

हवाएं सर्द पड़ गयीं…उनकी लोरियां खामोश हो गयीं।

और एक नीरवता हवा में घुल गयी।

उन्हें पालने में पीपल ने अपना सर्वस्व लगा दिया।
यह जानते हुए कि ज़रा सा मौसम बदला और पत्तें उसे छोड़ कर चले जाएंगे।
जितनी आसानी से उसने उनके आगमन को अपनाया,
उतनी ही सहजता से उनके बिछोह को भी स्वीकारा।
पीपल के मन में ना कोई कड़वाहट आई ।
ना ही कोई मलीनता उसे छू ही पायी।

वह शुरू से अंत तक सफ़ेद ही रहा…बिलकुल माँ जैसा।

फिर एक नए बसंत के आगमन को अपनाने…
फिर कुछ नए कोपलों को…कोपल से पत्ते बनानें।

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गुरू भी तो पीपल ही हैं– हम कपोलों को पत्ते बनाने वालें। उनके जीवन में हर तरह के लोग आते हैं। कुछ शिष्य बुद्ध हो जातें, तो कुछ अपने प्रारब्ध काटनें की जद्दोजहद में लगे रहतें।

गुरु अपने सत्य पर स्थिर रहते हैं।
पर जब कुछ शिष्यों के मन-मुताबिक न चलें तो वह उनके प्रेम को ठोकर मार मिट्टी (नश्वरता) के साथ उड़ जाते हैं और हर जगह ज़हर उगलने लगते हैं गुरु के प्रति।
सच ही है शायद.. .मनुष्य के बस का नहीं प्रेम।

सिर्फ इसलिए गुरु-निंदा जैसे कर्म की ओर अग्रसर हो जाना क्यूंकि गुरु आपके अनुसार नहीं चल रहें …. विकारों की किस हद्द तक गुलामी है!

बहरहाल, गुरु इन सभी शिष्यों से एक-सा ही प्रेम रखते हैं। हर व्यवहार से निर्लिप्त…वैराग्य ओढ़ अपने सत्य पर अडिग–अनंतकाल तक सिद्धों और बुद्धों की परंपरा संभालते हुए।

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