ये विचार मैंने हिंदी दिवस 14 सितम्बर को, एक ग्रुप में पोस्ट किऐ थे।

आज हिंदी दिवस है हिंदी प्रेमियों का विशेष दिन पर थोड़ा विडम्बना से भरा ।
इस दिन वो अपनी भाषा पर गर्व तो करते हैं मगर दिन पर दिन होते जा रहे इसके पिछ्ड़ेपन् पर दुःख भी। सोशल मीडिया,कार्यालय ,विधालय, कॉलेज कहीं भी देख लीजिये हर जगह अँग्रेजी का बोलबाला है। सच तो ये है की आज आजादीे के 75 वर्षो बाद भी हम सिर्फ् अंग्रेजी को ही कूलीन् और हिंदी को पिछडी हुई भाषा समझने वाली मानसिकता से ग्रस्त हैं । अंग्रेजी ग्लोबल भाषा है इस् में कोई दो राय् नहीं इसलिए इसका विकास चहुमुखी हुआ है पर इसके लिए हिंदी को द्वितीय दरजे की भाषा समझना भूल है। जब लोगों का नजरिया इसके लिए बदलेगा तभी इसको सही जगह मिलेगी ।
सरकार् को हिन्दी के विकास के लिए विशेष योजनायें चलानी चाहीए और इस दिशा में काम कर रहे लोगों को रोज़गार के अवसर उप्लब्ध् कराने चहिए। इसके बिना ये समभव् नहीं।

और व्यक्तिगत रूप से हर माता पिता और शिक्षकों को इसकी अहमियत बच्चों को समझानी चहिए । क्या इसके पतन के लिए वो माता पिता जिम्मेदार नहीं जो बच्चों को सिर्फ अंग्रेजी पढ्ने की हितायद् देते है। क्यूँ नहीं वो उनके हृदय में इस भाषा के लिए वही सम्मान रखते जो अंग्रेजी के लिए।

एक् और बात जो हिंदी के उत्थान् में बाधक है वो इसका धर्म से जोड़ा जाना। जब भी हम किसी भाषा को एक विशेष धर्म के साथ जोड़ देते हैं तो दुसरे समुदायों की रूचि उसमें कम हो जाती है। जैसे ये समझा जाना की हिंदी सिर्फ हिंदुओ की और उर्दू मुसलमानो की भाषा है पूरी तरह गलत है । हर भाषा की अपनी सुंदरता होती है इसलिए उसको किसी भी धर्म या जाति के चश्मे से नहीं देखा जाना चहिए।
आज स्तिथि ये है की हिंदी भी अपनी अनेक स्थानिय भाषाओं के साथ अपने अस्तित्व पर प्रश्न लिए खड़े दिखती है। क्या ये भाषा हमारी संस्क्रति का अटूट हिस्सा नहीं? फिर् क्यूँ इसके भाग्य में ये सौतेलापन आया ।
मेरी राय् में हमें अन्ग्रेजी के साथ साथ हिंदी का भी प्रयोग करना चाहिए और् अपने दैनिक जीवन में और इसके विकास के मार्ग को प्रशास्त् रखना चहिए।
हिंदी मेरी फर्स्ट लेंग्वेज ( यानी प्रथम भाषा) है इसलिए दिल के बेहद करीब है।

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Vandana

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