ऐसा नहीं
सब यूँ होना
या न होना था

सब सपने पूरे होने थे
सब अपने हर्षित होने थे
सब कुछ मिल जाता मुझको
सब ढोंगी दुश्मन खोने थे

ना कभी चुपचाप मैं रोता
ना मुझसे कभी कुछ खोता
इन सपनों की उड़ान में
न कुछ चुकता ना मैं झुकता

हर हाथ मेरे कांधे पे रुकता
हर दोस्त मेरा जीवनभर होता
मेरे कदम अडिग अविलम्ब से होते
पाप पुण्य मेरे कहने से होते

पर क्या ऐसा भी है
जो सब जैसा हो
वैसा ही है

क्यों मांग मेरी सब पूरी हो
हर ऋतु मेरी मजबूरी हो
क्यों व्यक्ति हरेक मेरे मन की करे
रखना मेरा मन ज़रूरी हो

भगवान मेरी हर बात सुनें
प्रियवर मेरा गुणगान करें
मेरा छुआ सब स्वर्ण बने
जो ना मन की वो गर्द चखें

है जो जैसा वो क्यों बदले
क्यों समय मेरी मनमर्ज़ करे

निर्भय होकर गर जीना है
निर्भीक गरल सब पीना है
आँसू तो सबके साथी हैँ
फिर डर घुट के क्यों जीना है

रात घनेरी या घोर घटा
हर कदम मेरा अब मेरा पता
क्या जानू कहाँ अब पहुँचू मैं
अकरमण्य न अब ना विस्मितता

जीवन जब जिसने दान दिया
उसने मुझपे ये मान किया
हो मन का या ना मन का हो
जा कर्म तेरे अनमन ना हो
फिर लौट के मुझको तू ये बता
कुछ किया भला या सिर्फ व्यथा

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Manas Misra

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