बेटी के साथ बाज़ार जाते हुए गली की आख़री घर पे नज़र गयी तो आंटी मायूस सी खड़ी थी , हमारे बीचमुस्कान की पहचान थी. मतलब उसी रास्ते आते जाते एक दूसरे को देखे के हम मुस्कुरा देते थे. आंटी की सफ़ेदबालों पे सिंदूर की लालिमा ख़ूब सजती है. हाँ तो उस दिन मायूस आंटी को देख के में अचानक से बोल पड़ी , क्या हुआ आंटी थोड़ा मुस्कुरा दिया करो इतनी भी क्या ग़म है, सुनते ही आंटी की मोहक हँसी छूट गयी ,बोलपड़ी अरे नहीं बेटा कोई बात नहीं तेरे अंकल जी काफ़ी देर से बाज़ार गए हैं शुगर की बीमारी है उन्हें लेकिन छुपके मिठाई खा लेते हैं  वही डर है कहीं खा ना ले . मैं बोली , आंटी अंकल को करेला का रस पिलाओ , मिठाईखाने को मन ही नहीं करेगा , और उसके बाद  हम ख़ूब ठहाके मार के हसें . एक दूसरे को हाथ हिलाया और मेंआगे बढ़ गयी . बेटी बोली मम्मा आप किसी से भी बात कर लेते  हो कैसे ? में बोली इंसान को और एक इंसानसे बात करने के लिए हमेशा पहचान की , या मोबाइल की ज़रूरत होना ज़रूरी है क्या बेटा ? ये बातें भी किसीदबाई से कम नहीं , बेटी बोली हाँ मम्मा आंटी कितनी ख़ुश थी आप से बात करके ,माई ऑल्वेज़ हैपी मम्मा ,मेंभी हैपी आप की तरह हैपीरहूँगी हमेशा . पढ़ाई को लेके फ़िक्र करते हुए बेटी के मुँह से ये सुनके बहुत अच्छालगाथा उसदिन, पता नहीं क्यू एक सुकून सा मिला था .        

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shelly swain

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