Not all words speak and not all minds thinks. Not all flowers spread fragrance and not all trees fruitify. 

Words also must have some or the other requirement if they need to live – some sort of oxygen to breath. Else, why, today, they are so dull and unlively!  So much unwilling to come out and get themselves seated in some small corner! 

Or is it the mind who is playing culprit.  Not letting any clear thought to emerge and get decked up with some lively, beautiful words.

मैंने शब्दों संग कई शामें बिताई हैं

कभी किसी के लिखे शब्दों को पढ़ने में 

तो कभी नये नये शब्द बनाने में

मैंने शब्दों को सजे संवरे भी देखा है

और कभी रोते कुरलाते भी 

पर रहे हमेशा ये मेरे आस पास ही 


अब तो ये भी साथ छोड़े जा रहे हैं

मेरे भरोसे को तोड़े जा रहे हैं

इन्हें भी मेरा साथ नहीं  भा रहा

तभी तो कोई शब्द लिखने में

 नहीं आ रहा

न शब्दों को कोई चाह है जीवन की

न विचार ही पैदा होना चाहते हैं

आज की शाम सब को विराम

सबको शब्बा खैर….

सबको राम राम…..



जय श्री हरि 🌹



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