Sharing a poem with all os.me friends.

As India turns 75, I hope we rise above all the obstacles and achieve the true greatness that it deserves. I know there are a lot of “if  & buts” … but hope is a very strong tool and I am sure we will get there.

I wrote it yesterday early morning and then my son Shreyansh helped me with his original music as background music. Thanks to him for creating the video as well.  

I hope you will like it. Appreciate your comments and feedback and how you parse it at your end. Apologies to friends who do not know Hindi, I will try to add translation later. 

पछत्तर

आ पछत्तर साल, हम कुछ यूँ मनाएँ
हरी धरा पे झूमता, केसरी नभ सजाएँ

आ पछत्तर साल, हम कुछ यूँ मनाएँ!

श्वेत सा वो क्षितिज, जिसमें शोक ना हो
चक्र सा अनवरत, जिसमें रोक ना हो

उस हिमालय से भी ऊँचा, गर्व जिसका
और माटी में मिला हो, फ़र्ज़ सबका

आ पछत्तर साल, हम कुछ यूँ मनाएँ
हरी धरा पे झूमता, केसरी नभ सजाएँ

आ पछत्तर साल, हम कुछ यूँ मनाएँ!

है नमन हर वक्त, तुझको हर दिशा से
सज रहे हों गीत तेरे, हर ज़ुबाँ में
तुझ में जीते हम, तू जीते सभी में
बात तो है ख़ास, कुछ तेरी ज़मीं में

आ पछत्तर साल, हम कुछ यूँ मनाएँ
हरी धरा पे झूमता, केसरी नभ सजाएँ

आ पछत्तर साल, हम कुछ यूँ मनाएँ!

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Saurabh Dixit

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