Happy New year everyone !!!

I was happily surprised with a small story Swami Ji mentioned in his discourse on New Year, where he shared a beautiful perspective on how परछाई (shadow) can add confusion and showcase our ignorance.

But why I am happily surprised with it? It is because it maps to a poem I wrote almost 10 years back and recited recently (see attached) that tries to capture the same perspective. It feels great when I saw it aligned so well with what Swami Ji shared with all of us.
And for me, it’s a great way to start the year 🙏

Please let me know what you feel about the poem. YouTube video has 3 poems of mine and “Parchhai | परछाईं” starts around 03:45.

-: Parchhai | परछाईं :-
by : Saurabh Dixit, Feb 2011

छाँव को ले कर मचा बवाल, पंछी-सूरज गुस्से में लाल

भीड़ इकठ्ठा, करे सवाल, लाल-बुझक्कड़ बूझो हाल
भीड़ ने अपना रंग दिखाया, अपना-अपना गणित सुझाया,

कुछ लोगों ने मूढ़ हिलाया, कुछ ने अपना कान खुजाया,
कुछ ने थोड़े चने चबाये, कुछ ने अपने दांत दिखाए.

मसला फिरता रहा वहीँ पर…
आख़िर पंहुचा काज़ी के घर पर..

बादल काज़ी बनके बैठा, बोला अब सब धीरज रख्खो.
मैं सुनता हूँ दर्द तुम्हारा, आकर अपनी अर्जी कह दो,

पंछी, फड़-फड़ कर के आया, छाँव मेरी है उसने गाया.
साथ लिए मै इसको फिरता, संग मेरे है साया चलता

जग जाने है सच्ची बात, न्याय करो तुम मेरे साथ
सूरज ने बिचकाया मुँह, कहा बात तू ध्यान से सुन

मुझ बिन किसकी कैसी छाया. चाल भले तू कैसी चुन
मुझ संग घूमे दिनभर है जो, कैसे कहता तेरी है वो?

सुनकर सब की गहन दलील, बादल ने फिर बात बढाई
कहा तमाशा हुआ बहुत अब, खामोश किसी ने टांग अड़ाई

कहा कि सोचो, लड़ते किस पर?, किस पर है ये आँख लगायी?
परछाई तो परछाई है, बोलो किसके हाथ ये आई?

सूरज जितना तेज दिखाए, पंछी जितना पर फैलाये,
बोलो किसको नज़र ये आये, धरती गर न गोद बिछाये.

समय बदलता जिसको नितदिन, क्या दंभ उसी का भरते हो?
जिसको तुम हो अपना कहते,क्या मर्ज़ी से है चलती वो ?

चिंता छोडो.., जग हँसने दो , परछाई को उन्मुक्त बना दो
बाँह गले में डाल के दौड़ो, मुस्कानों को साथ सजा लो.

Photo by Barbara Rezende on Unsplash

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Saurabh Dixit

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