अन्तः की पुकार

मेरा-तेरा, अपना-पराया से परे है वह
हजार वेदना, हजार दुखों की आर्त पुकार है वो,
हाँ, वह मेरा ही सार है।
मेरी अन्तः की पुकार है वह।।

स्वार्थ-निस्वार्थ, सुख-दुख से अछूत है वह
अनकही कहानियों, अगिनत सपनों का आधार है वो,
हाँ, वह मेरा ही सार है।
मेरी अन्तः की पुकार है वह।।

जीवन-मरण, यश-अपयश से सूक्ष्म है वह
सुलझे-उलझे विचारों, सुदृढ़ कर्मो का जाल है वो,
हाँ, वह मेरा ही सार है।
मेरी अन्तः की पुकार है वह।।

लाभ-हानि, मोह-माया से आजाद है वह
अव्यक्त भावनाओ , बेगाने अपनों की टीस है वो,
हाँ, वह मेरा ही सार है।
मेरी अन्तः की पुकार है वह।।

ज्ञान-अज्ञान, पक्ष-विपक्ष के तर्क से बाहर है वह
शुद्ध चेतना और पुरुषार्थ की पुकार है वो,
हाँ, वह मेरा ही सार है।
मेरी अन्तः की पुकार है वह।।
                                              :-अमित सूर्यवंशी
#Suryavanshiquotes

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अमित सूर्यवंशी

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