अपने :
एक बहुत छोटा और खूबसूरत शब्द ,
जिसे सुनते ही लगे की जैसे मैं एकेला नहीं हूँ ।
है कोई मेरा अपना जो मेरे साथ है।
तो आखिर ये अपने होते कौन है ?
क्या सिर्फ साथ रहने से अपने हो जाते है ?
शायद नहीं ,
अपना वो नहीं जो एक साथ एक छत के निचे रहते हो ,
अपना वो जो मीलों दूर होता हुआ भी आपके ख़ुशी और गम को महसूस कर सके।
अपना वो नहीं जो एक परिवार का सदस्य हो ,
अपना वो जो अजनबी होते भी आपको समझ सके।
अपना वो नहीं जिसके आगे दुःख में बताना पड़े ‘
अपना वो जो बिना कहे सब समझ जाए और साथ दे।
अपना वो नहीं जो खून के रिश्तों से जुड़े होते है ‘
अपना वो जो आपके बिना कहे आपके दर्द को पहचान सके।
अपना वो नहीं जो सिर्फ उनकी जरूरत के समय आवाज़ दे ‘
अपना वो जो दूसरों की जरूरत और दर्द को समझे और उनको उस समय एकेला न छोड़े।
इस दुनिया ने सिखाई मुझे अपनेपन की जिम्मेदारी ,
जब खुद को एकेला पाता है इंसान जरूरत के समय
तब जा कर समझ आता है की कितना जरूरी होता है ये अपनापन।
वो अपनापन , जिसमे कोई मजबूरी या लालच ना हो ,
बस निस्वार्थ प्रेम जिसके आगे भगवान् भी झुक जाए।
और आज का इंसान शायद इसी को भूल कर बैठ गया है ,
करता है अपनों को याद जब उन्हें जरूरत होती है
और ये क्या
जरूरत ख़तम होते ही ख़तम हो जाता है वो अपनापन।
पर मेरे प्यारे स्वामीजी ,
अपनेपन की मिशाल हो आप
आपसे ही सीखा मैंने अपनेपन का पाठ ,
आपके आशीर्वाद से मिला मुझे बेइंतिहां अपनापन
आपकी ही माला के पिरोए हुए से वो मोती ,
जो अजनबी होते हुए भी , अपनेपन की कसौटी पर खरा उतरते है।
है तो नहीं उनसे कोई नाता पर न जाने ,वही क्यों बस अपने से अब लगते है।
कृतार्थ हुई मैं ये जनम पा कर ,
जिसमे हुआ मुझे अपनेपन का एहसास मेरे अपनों से

Swamiji , Thank you so much

and Thank you everyone for being with me.