“हार्दिक आभार महादेव, तभी तो आप करुणामय देव कहलाते है। मेरे हठ को मिटा कर, बिना किसी साधना के वरदान से लिप्त कर दिया।”

“आपका स्थान अति दिव्य है। अपना अभीष्ट सम्पूर्ण करने के बाद, आपको अपनी लीला कैसे समाप्त करनी है। इस विषय पर हम बाद में चर्चा करेंगे।”

इतनी देर में द्वारपाल ने भीतर आने के लिए बाहर से ही आज्ञा माँगी, “स्वामी, नंदी और वासुकि आपके दर्शन अभिलाषी है।”

महादेव की आज्ञा से नंदी और वासुकि को अंदर बुलाया गया। और उनके साथ ही देवी जगदंबा भी सभा कक्ष में प्रवेश कर गयी। सभी के मन में एक उत्कंठा थी कि यह नया शत्रु कौन था? नंदी ने बताना शुरू किया कि जब तक नंदी और वासुकि अन्य गणों सहित वहाँ पहुँचे तो वह शत्रु आघात करके जा चुका था। घटना के समय कुछ गिनती के लोग ही वहाँ उपस्थित थे जो कि खाण्डव वन के पास अपनी दिनचर्या का काम काज कर रहे थे। इन में से एक शंख और बलि का घनिष्ट मित्र भीमा था। भीमा राजमहल में रात्रि के पहरे के लिए एक सुरक्षा कर्मी भी था। और आज वह खाण्डव वन में काम कर रहा था।

नंदी और वासुकि के पूछने पर उसने बताया, “मैं अपने पशुयों के लिए जल और घास इत्यादि का प्रबंध कर रहा था कि मुझे बहुत ज़ोर ज़ोर से पत्थर टकराने की आवाज़ें सुनी। कोई भारी भारी वृक्षों को उठा उठा कर फेंक रहा था। पहले तो लगा कि शायद किसी ग्रह से उल्कापात हो रहा था। लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि यह आवाज़ वन में से आ रही थी। आरम्भ में कोई भी दिखाई नही दे रहा था। लेकिन जैसे ही मैंने उस नए शत्रु को देखा तो वह विश्वास नही कर पाया और आँखें फाड़ कर देखता ही रह गया। क्यों कि वह कोई और नही, महादेव थे।” “ऐसा कहना तो घोर अपराध होगा कि महादेव चिंतामणि गृह को नष्ट कर रहे थे, परंतु ऐसा भी नही कि यह महादेव की कोई माया नही थी। उस अज्ञात शत्रु और महादेव में केवल, जटायों और नेत्रों का अंतर था। महादेव की लम्बी और खुली जटाएँ है परंतु उसकी जटाएँ नही थी। महादेव के नेत्रों का रंग गहरा भूरा है और उसके नेत्र नीले रंग के थे। वह केवल क्रोध से हुंकार कर रहा था जिस से वह और भी भयानक दिखाई दे रहा था।”

ऐसा सुन कर नंदी और वासुकि को विश्वास नही हुआ। परंतु भीमा बिल्कुल सत्य कह रहा था, उसकी बात की पुष्टि वहाँ स्थित अन्य लोगों ने भी की। यह सूचना अत्यधिक महत्वपूर्ण थी तो महादेव को बताना आवश्यक था।

नंदी और वासुकि की बात सुन कर सभी के चेहरे पर एक चिंता आ गयी और गहरी सोच में पड़ गए। माँ जगदंबा को लगा कि इन दिनों महादेव रात्रि में शमशान में भी निवास कर रहे थे। कहीं शायद उसी के संबंधित कोई माया ना हो। बहुत ही विस्मय बात थी कि सब में से केवल महादेव शांत थे। क्यों कि जब महादेव का विचलित होते थे तो प्रलय का आगमन होता था।

सभी महादेव की ओर देख रहे थे कि आगे के लिए क्या आज्ञा थी और क्या यह वास्तव में ही महादेव की माया थी?

“नंदी और वासुकि, आप गणों की अलग अलग टुकड़ियाँ बना कर उस शत्रु को ढूँढो, शांतिपूर्वक उसका परिचय पूछो और उसकी अभिलाषा पूछो। और अंत में अगर इस वार्ता का कोई परिणाम नही निकलता, फिर उसे युद्ध के लिए ललकारो। अगर वह युद्ध करता है तो वहीं उसका वध करके चिंतामणि गृह को अभयदान दे देना। स्मरण रहे, शत्रु के सामने भी हम अपने आचरण को नही भूलेंगे।”

“महादेव, हम उसका चिंतामणि गृह से बीज तक समाप्त कर देंगे। वो हमारे शौर्य के आगे टिक भी नही पाएगा। बस आप आज्ञा दीजिए।” नंदी ने बिना सोचे समझे आक्रोश में यह शब्द कह दिए

“कभी भी अज्ञात शत्रु को निर्बल नही आंकना चाहिए, यह युद्ध नीति का एक नियम है।”

“क्षमा महादेव।” ऐसा कह कर नंदी और वासुकि ने महादेव को प्रणाम करके तेज़ी से बाहर की ओर चले गए।

सभी के मुख पर एक संतुष्टि आ गयी कि महादेव की कृपा से अब सब अच्छा हो जाएगा।

देखते ही देखते चिंतामणि गृह का एक बड़ा हिस्सा, युद्ध की छावनी में बदल गया। सेना की कई टुकड़ियाँ चिंतामणि गृह के विभिन्न वनों की ओर, सुनसान जगहों पर और निर्जन पर्वतों की ओर नगाड़ों को बजाते बजाते कूच कर गयी। यह सभी विशिष्ट सैनिक भी मायावी थे। युद्ध कौशल के साथ इन सैनिकों से तप और साधनाए भी सम्पन्न करवायी गयी थी। सबकी माया का स्तर भी अलग अलग था।

सेना की एक टुकड़ी जैसे ही मोक्ष वन के पर्वत की तरफ़ बढ़ी, वन में हल-चल शुरू हो गयी। और सेना के ऊपर विशाल पेड़ों और पत्थरों से प्रहार होने लगा। सेना को एक महादेव नही, असंख्य महादेव दिखाई दे रहे थे, जो उनके ऊपर नुकीले पत्थरों से प्रहार कर रहे थे। प्रवृति वश सेनानायक ने वापिस प्रहार करने की बजाए, उस दैत्य में महादेव का स्वरूप देख कर दण्डवत प्रणाम करनी आरम्भ कर दी। इस प्रकार सभी उस दैत्य की माया में फँस गए थे और पत्थरों की चोट से मूर्छित होने लगे।

जैसे ही नंदी और वासुकि को इसकी सूचना मिली और वह लोग मोक्ष वन में पहुँच गए। इतनी विकट परिस्तिथि देख कर नंदी को महादेव के दिए हुए सारे निर्देशों का स्मरण ही नही रहा। उसने क्रोध में ललकार कर कहा, “दुष्ट, कहाँ छिप छिप कर वार कर रहा है? अगर सत्य में तू एक वीर योद्धा है तो योद्धा की भाँति युद्ध कर। मायावी बन कर नही।”

“अब से चिंतामणि गृह पर मेरा शासन होगा। मैं ही परमशिव हुँ, मैं ही सम्पूर्ण हुँ।”

आचरण का स्मरण 4

“तू और महादेव! अधर्मी, इतने घृणित कार्य करने के बाद तू स्वयं को महादेव कह रहा है? अगर स्वयं के प्राण बचाना चाहता है तो अपना परिचय दे।” अब तक क्रोध से नंदी की आँखें लाल हो चुकी थीं।

“मूर्ख, क्या तुझे मेरा दिव्य स्वरूप दिखाई नही दे रहा? क्या तुझे अपने स्वामी की बाघछाल, दिव्य स्वरूप और कुंडलों, रुद्राक्ष मालायों की पहचान भूल गयी? बहुत ही कच्चे सेवक निकले तुम तो।”

नंदी का माथा एक दम से ठनक गया। उसे सहसा महादेव की खोयी हुई रुद्राक्ष मालाओं, दिव्य कुंडलों और बाघछाल का स्मरण आ गया। इस से पहले नंदी कुछ करता या कहता, नंदी के लिए ऐसे अपमानित शब्द सुन कर, वासुकि ने क्रोध से ज़ोर से एक फूंक लगा दी। जिस से सारा वन विष अग्नि से ही जल गया। एक तक्षक सर्प के रूप में वासुकि ने उसको डसने के लिए आक्रमण किया। दैत्य ने वासुकि को हवा में से ऐसे उछल कर पकड़ा जैसे कोई वयस्क किसी बालक को उछल कर पकड़ता है। उसने वासुकि की पूँछ और धड़ को इतनी शक्ति और कठोरता से घुमाया कि वासुकि, सर्प रूप में ऐंठ गया। वासुकि हिल भी नही पा रहा था और बहुत ज़ख़्मी भी हो चुका था।

“सर्पों को मारने से मेरी प्रतिष्ठा निम्न हो जाएगी।” उस दानव ने क्रोध में यह कह कर वासुकि को दूर हवा में फेंक दिया।

“क्या तुम्हें अभी भी शंका है कि मैं सदाशिव नही हुँ?” नंदी की तरफ़ उसने अपनी गर्दन घूमा कर मुस्कुराते हुए कहा

आज तक इतने दैत्यों के साथ युद्ध हुआ लेकिन किसी ने स्वयं को परमशिव नही कहा था। शिव स्वरूप में यह विचित्र और शक्तिशाली दैत्य था जिस ने इतना प्रतिबंध होते हुए भी चिंतामणि गृह पर आघात करने का साहस किया था। अपने स्वामी महादेव के लिए बार-२ ऐसे शब्द नंदी से सुने नही जा रहे थे। उस ने क्रोध में आकर एक बैल का रूप धारण कर लिया और अपने नाथूने फुला कर आक्रमण करने के लिए बहुत ही तीव्र गति से उस दैत्य की ओर दौड़ पड़ा। लेकिन उस शक्तिशाली दैत्य ने एक ही क्षण में नंदी को सींगों से पकड़ कर पूरी शक्ति से हवा में घुमा कर, धराशायी कर दिया। महादेव ने जो निर्देश दिए थे, उनका स्मरण नंदी को अब हो रहा था। नंदी को याद आ रहा था कि शत्रु को कभी भी निर्बल नही आंकना चाहिए और इस दैत्य से आरम्भ में शांतिपूर्वक वार्ता करनी चाहिए थी, शायद कुछ और निष्कर्ष निकलता। लेकिन नंदी इस दैत्य से क्षणों में ही परास्त हो चुका था।

दैत्य, नंदी की गर्दन पर अपने नाखून गढ़ा कर बोला, “क्या तुम्हें अब भी मेरा परिचय चाहिए, तो सुन।”

To be continued…

सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके।

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

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