आजकल अपने फटे कपड़ो में
खुद कुछ पैबन्द टाँक लेती हूँ,
भीड़ से परे हट कर अब,
भीतर खुद के झाँक लेती हूँ |

कल तक होड़ लगी थी कि 
बन जाऊँ दुनिया जैसी
अब अपने बिखरे बालों-सी
उलझी- बेखौफ जीती हूँ |
जब परियाँ अपने चहरों को
निखारने में मशगुल रहती हैं,
अपने ढलते साँझ-रंग में
कुछ दाग और छाप लेती हूँ |
फ़र्क पड़ता था पहले कि
जूते किस सलीखे के हैं,
अब घर में पड़ी चप्पल
करीने से टाँक लेती हूँ |

ऑटो-ओला छोड़ कर,
बूढ़े रिक्शे वाले की
आँखों में झाँक लेती हूँ

जिसे भिखारन कह कर भगा देती है दुनिया,
उसमे माँ को भाँप लेती हूँ|

कपड़ो की तरह रिश्ते नहीं
बदले जाते मुझसे अब|
आज भी उस पुरानी-सी
मोहब्बत का जाम पीती हूँ |
तूफ़ान बन जिस सागर के उपर
उड़ा करती थी कभी,
अब मौन बन उसकी
गहराई में जीती हूँ |

रास्ता अलग,मंज़िल अलग,कहकर
इस दुनिया से भाग लेती हूँ |
रास ना आये बंददिशे ये सारी
अब नीले आसमान में साँस लेती हूँ |

16 years on the Path. Almost every single soul I have ever known has left (barring a few❤). Except Swamiji. He came. He accepted me as I was, all covered in caustic pungent odour a trunk full of Vikaars (afflictions). He promised He won’t leave. And He didn’t. Life has been simple since.  Swamiji💙

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Snigdha

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