मैंने बहुत पहले स्वामी विवेकानंद को पढ़ा था जिसमें से उनकी एक बात मेरे हृदय में ऐसे अंकित हो गयी जो मेरे समस्त विचार, निर्णय, कल्पना इत्यादि को संचालित करने का एकमात्र आधार बन गयी I और वो कथन है “ सिधांत नहीं बदला करते अपितु तल के संदर्भ अनुसार परिणाम भिन भिन नज़र आतें हैं “I 

उदाहरण के तौर पर : यदि शरीर के किसी अंग में आपको पीड़ा है तो आप बार बार उसे जानबुझ कर महसूस करके उससे उभरने का प्रयास कर्तें हैं I उसी प्रकार यदि आप जागरूकता से देखेंगे तो पाएँगे कि हमारे जीवन में एक ही तरह की कष्टदायक घटनाएँ क्रमशः कुछ वर्षों में दोहरातीं रहतीं हैं I  तो क्या हम कह सकतें हैं कि अवचेतन मन का एक पहलू यह भी है की वो किसी भी तरह की पीड़ा से निकलने के लिए उसे बार बार दोहराने के लिए हमें कार्यरथ करता है ?

आप सोच रहें होंगे कि मैं आपको इस प्रकार से अपने अनुभव क्यों बताने लगा लेकिन मेरा यही अनुभव ही  नीचे रचित कविता का आधार है I 

तो इसे पढ़ते समय आप यह भाव रख सकतें हैं की हमारे गहरे अवचेतन मन में एक आकर्षक शक्ति का प्रतिबिम्ब है जिसे हम अपना कृष्ण भी कह सकतें हैं I हम किसी कारण वश इससे दूर हो गए हैं I यही शक्ती हमें सारे क्रित करने के लिए प्रेरित करती है जो कभी कभी कष्टदायी और बाहरी तौर पे कुरूप होतें हैं और हमारे जीवन में कसाव पैदा कर्तें हैं I और अंततः यह कसाव या कंस अपने कृष्ण में तिरोहित हो जाता है I 

 

विरह से उभरने के लिए मैं फिर पुराने घावों को आज में लाता हूँ 

जब था द्वारपाल तो कर दिया परित्याग अब अपना उग्र स्वरूप दीखाता हूँ 

कन्हीं मैं कंस तो नहीं जो अपने कृष्ण को बुलाता हूँ I

 

ख़ुद तो दुखी हूँ हीं , अपनों को भी ग़ैरों जैसा रुलाता हूँ 

सबको पीड़ित कर तुम तक एक छोटा मार्ग बनाता हूँ 

कन्हीं मैं कंस तो नहीं जो अपने कृष्ण को बुलाता हूँ I

 

अपने आस पास की पनपती हुई अछाइयों से घबराता हूँ

जो थे कभी मेरे आज स्वयं उनका गला दबाता हूँ 

कन्हीं मैं कंस तो नहीं जो अपने कृष्ण को बुलाता हूँ I

 

नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले पिता को तो दिल के जेल खाने में शाड़ाए जाता हूँ 

अपनी हरेक प्रवृति को बिना किसी लेबल दिए अनुभव कर पार किए जाता हूँ 

कन्हीं मैं कंस तो नहीं जो अपने कृष्ण को बुलाता हूँ I

 

अनेकों ग़ुरूर तोड़ दिए की तुम्हारा ध्यान पाना चाहता हूँ 

ये सारे ग़ुरूर रूपी पुष्प थे जो अपने ईश्वर के चरणों में चढ़ाता हूँ 

कन्हीं मैं कंस तो नहीं जो अपने कृष्ण को बुलाता हूँ I

 

नीरस्ता की साँसों में इस जीवन से घुटता हूँ  

अंसुअन से स्नानकर प्रतीक्षा का अलंकार कर स्वयं को सजाता हूँ 

कन्हीं मैं कंस तो नहीं जो अपने कृष्ण को बुलाता हूँ I

 

आख़िरकार तेरी कृपा के रस में ऐसे डूबता जाता हूँ 

की कंस और कृष्ण को एक ही झूले में झूलाता हूँ

नहीं मैं कंस और कृष्ण में अब भेद ही नहीं जान पाता हूँ I 

 

कंस के मृत्यु के समय एक बहुत ही सुंदर श्लोक आता है जो कि महाभारत धारावाहिक से लिया गया है और वो इस प्रकार है I 


मारक सम्हारक नहीं, ऊधारक श्री नाथ 

सदगती पायी असुर ने, मर के हरी के हाथ 

कूमती गयी पायी सुमती, अहम बन गया हंस 

नारायण दर्शन हुए, शांत हो गया कंस I

दीपक पाठक  

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Deepak Pathak

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