एक बार की बात है। दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य के एक गाँव में एक महात्मा पधारें। महात्मा थें direct महाराज के दीक्षा गुरु। तो जैसे ही ख़बर लगी गाँव-वालों को कि साक्षात महाराज के गुरूजी पधारे हैं, तो लाइन लग गयी सड़क पर। दर्शन के लिए आदमी आयें। औरते आयीं। बच्चे आयें। दादी-दादा आयें। फूल-पट्टी आयें। नारियल आयें । केला आयें। सेब आयें। बाबाजी मंद-मंद मुस्कुरायें।

उसी गाँव में रहता था कल्लूराम और उसकी बीवी, कौरी। कल्लू का दिमाग दर्शन से आगे भागे। वो गया बाबाजी के पास और बोला,

“कल्लू नाम। बाबा को परनाम। दीक्षा दे दो। चेला बनूँगा।”

बाबाजी ठहरे राजगुरु। उनका अपना अलग ही swag। टशन में पीछे टिकके बोलें,

“अहाँ! दीक्षा-उक्षा अभी नहीं। चेला ना बन, कलुआ। अगली बार ले लेना दीक्षा।”

कल्लू ना माने बाबा की बात। लग गया बाबा के पीछे तूतू की तरह दुम हिलाये। बाबा खायें, कल्लू ताके। बाबा सोयें, कल्लू घूरे। वक़्त-बेवक़्त कल्लू गाये,

“ए बाबा! चेला बनूँ रे! दीक्षा दे दे!”

बाबा हो गए तंग। उठाये अपना चिमटा और बोलें,

“करमजला! मचाये हुरदंग! भग जा बिल्कुल, नहीं चिमटा से बाल नोच देंगे!”

कल्लू डरके भाग गया।

गाँव के बूढ़े-बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठकर भैं-भैं करने लगा। सामने से गाँव का एक छोरा, बैला, जा रहा था। बैला के पूछने पर कल्लू बोला,

“सनकी बाबा चिमटा दिखाया। दीक्षा नहीं दिया। चेला नहीं बनाया।”

बैला थोड़ा सोचा फिर कल्लू को शांत करते हुए बोला,

”तुम दीक्षा-उक्षा छोड़ो, कल्लू भाई। बस मंत्र का सोचो। किसी तरह बाबाजी मंत्र दे दिए तो बस। वही दीक्षा है।”

कल्लू उसको घूरा जैसे वह किसी उड़नखटोला से गिरा हो और बोला,

“का दे दिए? का बोला? मंतर? यह कौन कीड़ा है?”

बैला थोड़ा चिढ़कर बोला,

“अरे! मरे! मंत्र यानी जपने वाला चीज।”

कल्लू सोच में पड़ गया।

“का जपें? कैसे समझे का मंतर है?”

बैला गंभीर होकर किसी साधू जैसा आसान लगा के बैठ गया और ध्यान करने जैसी मुद्रा बना के बोला,

“जो अजीब-सी भाषा में बोले बाबाजी, जो तेरी समझ के परे हो, वही मंत्र है।”

कल्लू खुश! रात में सो ना पाए। सुबह होने का इंतज़ार भी ना हुआ। मंतर निकलवाना है बाबाजी से बस! किसी तरह भोर तक रुका और फिर दौड़ लगा दिया उनकी कुटिया की तरफ।     

बाबा नित्य-कर्म आदि से फ़ुरसत होने भोर-तड़के लोटा उठाये जंगल से जा रहे थे। ज़्यादा रौशनी अभी हुई नहीं थी। बाबा मस्ती में राग छेड़ दिए,

“हम्म…अरे हल्का भोर सलोना, पवन करे सोर। पेटवा गुड़-गुड़ ऐसे, जैसे बन मा नाचे…”  

तभी पीछे से आवाज़ आयी,

“ए बाबा! चेला बनूँ रे! मंतर दे दे!”

बाबा चौंक के पीछे पलटें तो कल्लू हाथ जोड़ खड़ा था। बाबा लोटा पकड़के दौड़ लगा दिए।

“कमबखत! पेट भी शांति से साफ़ नहीं करने देगा क्या! अरे! बाबानंद, कहा फँस गया!”

नदी के पास पहुँचकर बाबा पीछे मुड़ें। कल्लू अपनी पीली-पीली बत्तीसी दिखा रहा था हाथ जोड़के। बाबा बोलें,

“इससे आगे तो अकेला छोड़ दे, कलुआ!”

कल्लू और बड़ी मुस्की मारते हुए बोला,

“मंतर?”

बाबाजी एकदम झन्ना गयें अबकी बार। लाल-मिरची हो गए। लोटा हवा में ऊपर उठायें और गुस्से में मातृ-भाषा बघेलखंडी में बोल पड़ें,

“मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ!”

कल्लू ठहरा दक्षिण क्षेत्र का। कन्नड़-तेलगु-संस्कृत का इलाका। उसको मध्य-भारत का एक dilect कहाँ समझ आएगा। और बैला ने कहा भी तो था कि जो ना समझ आये वही मंत्र! कल्लू के दिमाग की बत्ती जली। पीली बत्तीसी फिर से निपोर के बोला,

“मंतर!”

उसके भीतर का बन्दर आज डाल-डाल उछले। दूर से पाँव पड़के भागा वो वहाँ से सीधा घर। माला उठाया और जाप शुरू,

“मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ! मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ!”

कौरी सुनकर हैरान। ये क्या टोना-टोटका सीख आये पतिदेव! डर-डरकर बोली,

“अजी, खाना लगाऊँ?”

कल्लू जप करते हुए बोला,

“मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ! लगा दे!”

… “मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ! एक रोटी आउ दे।”

… “दाल बढ़िया बनाई है, कौरी। मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ!”

धीरे-धीरे कल्लू ऐसा जप में मगन हुआ कि कौरी को भी ‘मंतर’ सिखा दिया और दोनों भोर-रात देखे बिना हर काम के साथ बस जपते चले गए,

“मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ!”

रात को कल्लू सोता तो कौरी जपती। फिर कौरी सोती तो कल्लू जागता और जपता,

“मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ! मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ!”

कल्लू-कौरी साँस-साँस पर जप करते। हर काम के साथ जप करते। कभी-कभी काम-धाम छोड़कर बस जप ही करते जाते।

ऐसे करीब 3 साल बीत गए। एक दिन राजा का ऐलान आया,

“सुनो! सुनो! सुनो, गाँववालो! राजकुमारी बसंती पर भूत का साया चढ़ा है। कोई तांत्रिक, ओझा, बाबा, औघड़ कुछ नहीं कर पाए हैं। अगर किसी के पास कोई विद्या अथवा मंत्र हो, जो राजकुमारी बसंती को ठीक कर दे तो महाराज उसको अपना आधा राजपाट दे देंगे।”

कल्लू के कानो में बात गयी। कल्लू कौरी से बोला,

“मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ! हममें का कमी है, कौरी? गुरु बाबा का दिया मंतर है हमारे पास। गुरु बाबा सब सही करी। मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ!”

कौरी फूल-फूल जाए एकदम गद-गद ख़ुशी से। पतिदेव हनुमान जी बनने जा रहे। मुस्की मारके बोली,

“अजी! गुरु बाबा सब सही करी। मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ!”

कल्लू राजमहल की तरफ चल दिया। वहाँ का नज़ारा देखते ही बनता था। कोई तांत्रिक मंत्र फूके तो कोई ओझा झाड़ा लगाए। कोई औघड़ भभूति मेले तो कोई बाबा चिमटा दिखाए। भूत का कोई ठेंगा बिगाड़ न पाए। इतने में कल्लू आया। अपने दिल में अखंड विश्वास ‘गुरु-मंतर’ पर, राजकुमारी का गला पकड़ उनके कान में बोला,

“जय-जय, सरकार! मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ!”

भूत सहम गया । सोचने लगा,

“बाकी सब ओझा-बोझा तो दूर से फूँका-फाँकी कर रहे। ई दद्दा तो एकदम कान में आकर बोल रहा। भगता हूँ। कहीं सही का लोटा मारके खोपड़ी फोड़ दिया तो हो जाएगा मेरा किरया-करम दुबारा!”

और भूत राजकुमारी बसंती के शरीर से भाग गया।

कल्लूराम की जय-जयकार होने लगी। सारे तांत्रिक-ओझा सब फेल एक कल्लूराम के ‘गुरु-मंतर’ के आगे। कल्लू अब कल्लूराम से कल्लू बाबा बन गए। लोग हर दिन हाजरी लगाते कल्लू बाबा के घर पर। कल्लू बाबा सबपर कृपा करते और उनको भभूति देतें।

कल्लू बाबा की चर्चा गाँव-गाँव में फैल गयी। लोग दूर-दूर से कल्लू बाबा के ‘आश्रम’ आते और भभूति पातें। ऐसे में एक बार कल्लू बाबा की चर्चा महात्मा जी के कानो में पड़ी। उस वक़्त वो दंडकारण्य के वनो में वास कर रहे थें। दीक्षा तो दी नहीं थी तो नाम-वाम भी कुछ याद नहीं था महात्मा जी को। ख्याति सुनें तो सोचे की चलकर ‘सिद्ध’ के दर्शन किया जाए। महात्मा जी आकर कल्लू बाबा के भक्तों की line में लग गयें।

कल्लू बाबा ने जैसे महात्मा जी को देखा वो सब भक्तों को परे कर दंडवत हो गया उनके सामने,

“गुरु! गुरु! गुरु!”

महात्मा जी को बोध हो आया कि ये वही पगला है। पर वो ज़रा चकित थे। उन्होनें कहा,

“कलुआ! हम तो नहीं दिए तुमको दीक्षा।”

कल्लू हाथ जोड़कर बोला,

“आप दिए, गुरु! मंतर दिए। पहिले अपना बाल-बच्चा नहीं संभालता था। अब पूरे ग्राम के बाल-बच्चे संभालता हूँ।”

महात्मा को अच्छे से याद था कि दीक्षा तो नहीं हुई। कल्लू बोला,

“‘गुरु-मंतर’ जादू किया, गुरु।”

अब तो महात्मा जी को भी संदेह हो गया कि क्या सच में दीक्षा दी थी। कल्लू से बोलें,

“अच्छा ऐसा करो तो कि थोड़ा मंत्र बताओ हमको।”

कल्लू हँस के बोला,

“दुर! ऐसे सबके आगे थोड़ी। कोपचा आओ, गुरु!”

दोनों जंगल की तरफ चले गयें। महात्मा जी ने कहा,

“अब बताओ, कलुआ। सच-सच बोलना।”

कल्लू बड़े प्यार से अपने गुरु के दोनों चरणों को छूआ। चरण-कमल को पकड़े हुए ही ऊपर उनके चहरे की तरफ देखके बोला,

“मारब लुटिया, खपड़िया फूट जइ, गुरु।”

महात्मा जी को सब स्मरण हो आया कि हम तो सुबह सौंच के लिए जा रहे थे। कलुआ पीछे पड़ गया। हम तो डरा रहे थे उसको लोटा दिखा के। वो मंत्र मान बैठा! 

महात्मा जी तुरंत नतमस्तक होकर अपने कलुआ को उठायें। सीने से लगाकर बोलें,

“कलुआ, हमार बचुआ, लाला! गजब की बात हुई है! मंत्र चाहे कोई भी हो पर अगर भाव शुद्ध हो तो कोई भी मंत्र फलित हो जाता है।” 

“मूर्खो वदति विष्णाय, धीरो वदति विष्णवे। तयोः फलं तु तुल्यं हि, भावग्राही जनार्दनः।।”

मूर्ख कहता है, ‘विष्णाय नमः’, जोकि अशुद्ध है। और ज्ञानी कहता है, ‘विष्णवे नमः’, जो व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है। लेकिन दोनों को फल एक-सा ही प्राप्त होता है। क्योंकि भगवान जनार्दन नारायण शब्द नहीं भाव देखते और ग्रहण करते हैं।

-श्री चैतन्य भागवत, आदि-खंड, 11.108

Courtesy: Heard the gist somewhere. Tried to write in my own words. Jai Shri Hari-Ma! Love and light! 🙂 🙂

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Snigdha

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