कृतज्ञता

प्रभु मुझे ये जनम दिया , आपके करुणा से मैं कृतज्ञ हुआ,

यूँ तो कुछ विशेष न था , मानों कर्मफल शेष न था,

हे कृपा निधान! जग को क्या उसकी रूप दिखायूँ ?

तुलसी कबीर या दादू दयाल की कौन सी साखी मैं गाउँ?

क्यों मैं ऐसा आह्वान करूँ?
औरों की तरह बस आपकी निस्पंदन श्रींगार करूँ !

हो कालातीत तो छिपकर पता कर लेते तड़पते अभिसार

हो गुणातीत तो बिना स्पर्श के सजग हो जाता ये संसार

फिर क्यों देते स्व प्राण वो जो बहते निज अमिय- धार ?

हे दीनदयाल! जग को क्या उसकी रूप दिखायूँ!

केशव ! गूंजा था जब  शंखनाद प्रलय नित्य में विह्वल था सारा चराचर , जीव और मृत सामान ! 

हे पालनहार ! आज अनंत ज्वाला में जब भस्मसार् हो रहा आपका कल्प है, 

यहाँ हास्य और अमोद प्रमोद में डुब रहा यौवन ,
मधुशाला की उदासी और निर्जीव अकेलापन है !

कहाँ गयी कबीर की साखि? कहाँ है नानक के गुरमुखि ?
प्रभु! कहाँ है चैतन्य महाप्रभु के आंसू! कहाँ है भरत का भातृ प्रेम?

यहाँ ! चिर परिचित प्रश्नों का है भरमार !

विस्मित तत्थों से भरा पूरा है संसार,

की सहसा कोई पूछते आपके गोपियों के संधान !
कोई पूछते आपके परिधान , कोई कल्पना में रचते आपके   कृतदान , हे  कृपानिधान! 

प्रभु मुझे ये जनम दिया , आपके करुणा से मैं कृतज्ञ हुआ,

यूँ तो कुछ विशेष हुआ , मानों तो    एक  बलिदान शेष हुआ, 

प्रभु! अभय दो ताकि पूर्ण कर सकूँ यह निज बलिदान. 

धन्यवाद

धर्मो रक्षति रक्षितः

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Aarindm

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