After reading Ankit Ji’s

Mere to Girdhar Gopal Dusro Na Koi (No One else Belongs to Me Except Lord Krishna )

post , I remembered one poem which I had written on saint Meera bai’s life 🙏

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कुछ दिनों से मैं संत मीराबाई जीं के जीवन पर अभ्यास कर रहि हूं । उनके द्वारा कृष्ण पर लिखी रचनाएं और पदावली पढ़ रहि हूं । उनके जीवन का वर्णन करने के लिए मेरे पास एक हि शब्द है – समर्पण 🙏 

मैंने उनके जीवन पर एक कविता करने का प्रयास किया है । वहि आपके सामने प्रस्तुत कर रहि हूं ।

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मीरा सी दिवानी ना दूसरी कोई ,
उसके तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई .

बनके जोगन चली ,
बृंदाबन की कुंजगली में .
शिष्या बनके रैदास जी की ,
रहि संतों के संग में .

पीकर विष का प्याला , 
हो गई अमर जग में .
कृष्ण भक्ती के रस में डूबी ,
रंगी प्रीतम के रंग में .

छनकाई ह्रदय कि तान ,
बंधी प्रेम की ड़ोर से .
भजी कृष्ण भजन के दोहे , 
चली गोविंद के संग से .

लोक-लाज छ़ोड सबकुछ ,
नाचत घुंगरू बांध पग में .
दिन रात नैनों में नीर ढले ,
कृष्णसखा के गुणगान में .

ऐसी लगाई लगन पिया से , 
हुई मोहन के रूप कि लुभानी .
हरि उसके जीवन प्रान-अधार ,
भजत चरणकमल अविनासी .

उसका दरद न जाणै कोई ,
घायलसी घूमत फिरे निधीवन .
धन न भावै उसे नींद न आवै ,
विरह सताएं प्रभू प्रेम में रोएं
घडी एक नहिं आवडे उसे ,
हरी बिन कासूं जीवन लागे .

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर ,
मीरा दासी दरसण प्यासी .
कृष्ण चरणकंवल की दासी .

तन मन धन वो तो गिरधर पर लुटाई ,
पायो जी उसने राम रतन धन पायो .

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कहत मीरा रानी दिवानी ,

नटवर नागर नन्दा, भजो रे मन गोविन्दा,
श्याम सुन्दर मुख चन्दा, भजो रे मन गोविन्दा।
तू ही नटवर, तू ही नागर, तू ही बाल मुकुन्दा ,
सब देवन में कृष्ण बड़े हैं, ज्यूं तारा बिच चंदा।
सब सखियन में राधा जी बड़ी हैं, ज्यूं नदियन बिच गंगा,
ध्रुव तारे, प्रहलाद उबारे, नरसिंह रूप धरता।
कालीदह में नाग ज्यों नाथो, फण-फण निरत करता ;
वृन्दावन में रास रचायो, नाचत बाल मुकुन्दा।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटो जम का फंदा।।

🙏 Jay Sri Hari 🙏

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Amruta

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