एक ऐसा शहर जहाँ कला के लिए आबो हवा कुछ क़ुछ ठीक हो रही थी।बडी जद्दोजहद के बाद मैंने उस रंगकर्मियों की टोली को ढूंढा था।इन लोगों को एक ही बार में नहीं ढूँढ पाई थी मैं।दो कड़ियों को पार करके मैं इन तक पहुँची थी।पहली कड़ी को मैं सीधे तौर पर नहीं जानती लेकिन उसने मुझे इस टोली से रूबरू करवाया और इस टोली के एक सदस्य ने मुझे इस टोली की एक कलाकार का मोबाइल नम्बर  दिया ताकि मैं उनके अभ्यास स्थल पर पहुँच सकूँ।जहाँ मैं काम करती थी वहाँ से ये स्थल ज़्यादा दूर नहीं था ।जिस दिन मुझे मिलने जाना था मैने उसे फ़ोन किया और मैं फ़ोन पे बात करते करते ही दो मिनट के अंदर उसके पास पहुँच गई ।ज़ो चंचलता मैंने उसकी आवाज़ में महसूस करी थी वो दिखने में उतनी ही शांत थी ।लेकिन एक फूल की तरह खिली हुई।जब उनके अभ्यास स्थल पर पहुँची तो पता चला कि वो थी “ख़ामोश अदालत जारीहै”(विजय तेन्दुलकर द्वारा लिखित नाटक)की मिसेज़ काशिकर! लगभग हफ़्ते भर तक मैं इस टोली के साथ रही ।उसके बाद मुझे उसी लड़की ने एक दूसरे रंगकर्मियों की टोली से परिचय करवाया क्योंकि “विश्व रंगमंच दिवस” काफ़ी नज़दीक था और उन्हें किसी महिला कलाकार की एक नाटिका में ज़रूरत थी। इस तरीक़े से अब मैं दूसरी टोली के साथ रंगमंच करने लग गई थी।समय बीतता गया लेकिन उस परी जैसी लड़की से कभी कभी कुछ मौकों पर मिलना होता था,तो पता चलता कि वो क्या कर रही है -वो बाल भवन में बच्चों को नृत्य सिखा रही थी ,पत्रकारिता कर रही थी और ….और भी बहुत कुछ । किसी काम के सिलसिले में एक बार मैं उसके घर भी गई थी उसके परिवार से मिलीं।बस समय बीतता गया और वो आगे बढ़ती रही।फिर एक दिन अचानक यूँही फेसबुक खुल गई और मैंने देखा वो होस्पीटल बेड़ पर बैठी मुस्कुरा रही है और कुछ लोगों ने उसे घेरा हुआ है।आज भी उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा बिलकुल वैसा ही था जैसे कि सूरज अपनी रोशिनी एक छोर से दूसरे छोर तक फैला रहा हो ।हालाँकि अब उसके सर पर बाल नहीं थे लेकिन मुझे अब वो पहले से भी ज़्यादा प्रेरणादायक लग रही थी।इन तस्वीरों को देखने के हफ़्ते भर बाद ही मुझे मेरी एक सह कलाकार का फोन आया उसने बताया कि वो हमें छोड़कर चली गई! ये सुनकर मेरी रूह तड़प उठी ,घर पर माँ की किसी के साथ अनबन सुलझा रही थी,उसकाध्यान ही नहीं मुझे और मैं घर से निकल पड़ी उसके आख़िरी दर्शन के लिए ।मोक्ष द्वार से अंदर गई तो वहाँ कुछ और भी  पुरुष ,महिलाएँ,लड़के और लड़कियाँ थीं।इनमें से मैं सबको नहीं जानती थी, सब बैठे हुए थे तो मैंने सहसा देखा की बहार की दुकानों पर काम करने वाले कुछ लोग बहुत संदेह भरी नज़रो से अंदर जाती महिलाओं को टकटकी लगाकर देख रहे थे ।हम सब उसके इंतज़ार में सूखते जा रहे थे लेकिन ये इंतज़ार अब कुछ ही देर में समाप्त हो गया और वो शान से हम सबके बीच में थी। इस मंजर को देखते हुए ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति उसका श्रिंगार कर रही हो|पुरी विधि विधान के साथ वो अग्नि में समा गई।घर पहुँची तो महसूस हुआ कि मेरा कोई हिस्सा वहीं पर छूट गया था,और फिर माँ की आवाज़ कानों में पड़ी-“भला कोई बीर बानी(औरत) भी ऐसी जगह जाती है यहाँ तो सिर्फ़ मर्दों को ज़ाना होता है।”मैं मन ही मन सोचने लगी कि जो हमें छोड़कर गई है वो भी तो एक स्त्री थी बस फ़र्क इतना था कि उसकी सांसे पूरी हो चुकी थी और हमारी बाक़ी थी।तीन-चार दिन के बाद ही अपने दिन की कुछ प्रतिबद्धताएँ पूरी करने के बाद मैं उसकी शोक सभा में शामिल होने पहुँची।उसके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ अनोखा जानने को मिला।सब उसके चाहने वालों को मैंने बडे ध्यान से सुना।मानवता उसके रोम रोम में शामिल थी।बहुत कुछ था उसमें जिसे अपनाया जाए तो जीवन का स्तर ऊँचा उठ सकता है। यही वो लड़की थी जो रात को अकेले ही सड़कों पर जीवन व्यतीत करने वाले लोगों को निहारने ,उनके साथ खुशी के दो पल बाँटने निकल जाती थी।बिना भेदभाव के निसंकोच और निडर।जिंदादिली की प्रतिमा ,मुस्कुराता हुआ चेहरा और चमकती आँखे -हाँ अनिक्षु ये तुम ही हो!!

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Manisha Nandal Dahiya

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