दिवाली हिंदू धर्म के त्योहारों में से एक है। इस पर्व को दीपोत्सव कहते है । इस त्योहार की विशेषता यह है कि कई साल पहले एक राक्षस लोगों को तंग करता था। इस राक्षस को मारने के लिए कोई तैयार नहीं था। अंत में श्रीकृष्ण ने राक्षस को मारने का फैसला किया। जब दानव ने यह खबर सुनी तो वह डर गया। और एक गंदी जगह में जाकर छिप गया। छिपने की जगह में तेज बदबू आ रही थी। दानव ने सोचा कि कृष्ण यहां नहीं आएंगे। वह इस बदबू को बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे । वह इससे दूर जायेंगे और वह बच जायेगा । लेकिन कृष्ण ने बदबू को नजरअंदाज किया, और दानव को सीधे बाहर खींच लिया और उसे युद्ध के लिए चुनौती दी। दोनों के बीच एक बड़ा युद्ध हुआ । राक्षस हार गया । कृष्ण ने उसका वध करके उसे नरक भेज दिया ।

वह राक्षस था नरकासुर । उसके बाद कृष्ण ने सुगंधित तेल और सुगंधित उबटन लगाकर स्नान किया। रुक्मिणी ने उसकी आरती करके उसका स्वागत किया। घर में दीप जलाकर, दरवाजे पर रंगोली बनाकर, साथ ही घर में मिठाई बनाकर खुशी का इजहार किया। और यह दिवाली का त्योहार बन गया।

 हमारे बचपन में हम दिवाली खूब धूमधाम से मनाते थे । सबेरे पांच बजे उठकर उबटन लगाकर स्नान करते थे । फिर माँ हमारी आरती उतारती थी । बाद में रिशतेदारो के घर जाकर बड़ो का आशीर्वाद लेते थे । अब लगता है दिवाली पहले की तरह नहीं रही । सब कुछ जैसे बदल सा गया है । कुछ कुछ बातें अच्छी भी हो गयी है । जैसे पहले आकाशकंदील में हम तेल का दिया रखते थे, और वह लुढ़क जाता था और कंदील जल जाता था । और जब मेरी माँ छोटी थी तो कंदील पे हमारे वीर स्वतंत्र सैनिक के खून के दाग लग जाते थे । कंदील से पूछो तुम, उसने कई कहानियाँ देखि है । लेकिन नहीं बदला है, वह है प्रकाश।  जैसे दिवाली पहले भी प्रकाश से झगमगा उठती थी अब भी वही प्रकाश है । आशा का प्रकाश,  वीरता का प्रकाश, ज्ञान का प्रकाश । आओ इस प्रकाश में हम डूब जाये. 

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(Sorry for spelling mistakes)