मुझे बेबाकी से बात करने की आदत है और यह पोस्ट मैं उसी बेबाकी से लिखने की कोशिश करूंगा। मैं यह नही कहता कि जो मुझे लगता है बस वो ही ठीक है यां फिर जो मैं लिख रहा हूं, वही पूर्ण सत्य है। मैं एक अज्ञानी ही हूं।

मैं ओम स्वामी जी से पिछले साल से जुड़ा हुआ हूं और मेरे मन में उनके लिए अपार श्रद्धा और प्रेम है। वो एक सिद्ध पुरुष और महात्मा हैं। उन्होंने बहुत सिद्धियां और तप कर के प्रभु को पाया और जाना है। उन्होंने त्याग की जो मिसाल दिखाई है वो उन्हें बुद्ध के करीब ले जाती है। जब मैं उनसे मिला था तो मेरा रोम रोम प्रफुलित हो गया था और मेरे आंसू रुकने का नाम नही ले रहे थे। उनका तेज देख कर मैं नतमस्तक था। उन्होंने मुझे बहुत स्नेह दिया और मैं उनका आभारी हूं और हमेशा रहूंगा। मैंने उनको बताया था कि मेरा अंतिम पडाव भी सन्यास है लेकिन अभी मैं उसके लिए त्यार नही हूं क्योंकि मुझे लगता है कि मैं अभी सत्य, सन्यास, समाधि और साधना से कोसों दूर हूं और मुझे अभी बहुत समय लगेगा कि मैं इन शब्दों का मतलब तक समझ सकूं। मैंने स्वामी जी को बोला था कि मैं भी सन्यासी  बनना चाहता था लेकिन मुझ में इतनी लगन और काबिलियत ही नही थी और मैं सिर्फ़ खोखली बातें ही करता था लेकिन जब मैंने उनको जाना तो पता लगा कि समर्पण क्या होता है। वो हंस दिए थे। वो मेरा तात्पर्य समझ गए थे और शायद इसीलिए उन्होंने मुझे एक बात कही थी जो मेरे लिए बहुत मायने रखती हैं।

लेकिन जब मैं यहां मेंबर्स की पोस्ट्स पढ़ता हूं तो देखता हूं कि उन्होंने सन्यास, तप, साधना, समाधि, तंत्र और मंत्र जैसे बड़े बड़े शब्दों को बड़ी ही सहजता से उपयोग किया हुआ होता है। मुझे ऐसा लगता है कि वो इन शब्दों का उपयोग सिर्फ़ इसी लिए करते हैं क्योंकि ओम स्वामी जी इन शब्दों का अक्सर उपयोग करते हैं। मेरा यहां यह मानना है कि अगर ओम स्वामी जी इन शब्दों का उपयोग करते हैं तो वो इन शब्दों का भाव जानते हैं और उन्होंने इन सब को सिद्ध किया हुआ है। उन्होंने अपने पूरे जीवन को इन पर लगा दिया हुआ है। यहां मैं मूढ़ बुद्धि हो सकता हूं लेकिन मुझे ऐसा लगता है बहुत लोग इन शब्दों को सिर्फ़ शब्दों की तरह लिखते हैं बिना इनका भाव जाने। इनके पीछे उनका कोई तप नही होता। 

मेरा यह मानना है कि जब तक हम तप, सन्यास, समाधि, समर्पण, साधना, तंत्र और मंत्र को अनुभव नही करते, हमें इतनी सरलता और सहजता से इन के बारे में बात नही करनी चाहिए। यह सिर्फ़ शब्द ही नही हैं बल्कि यह अनुभव हैं जो इतनी आसानी से नही मिलते और अगर हम स्वामी जी की इज्ज़त करते हैं तो हमें इनकी भी इज्ज़त करनी चाहिए। मैं यह जानता हूं कि मैं गमले में रह कर बरगद की बातें नही कर सकता।

इस दो टूक बात के लिए आप सब से स्नेह की ही उपेक्षा रखता हूं।

एक अज्ञानी!!