ज्ञानी का ज्ञान लिख दूँ,ध्यानी का ध्यान लिख दूँ, 

लेकर कलम हाथ मे भक्त की … आज उसका प्राण लिख दूँ।

कहते हो तुम… है सब तुम्हारी कल्पना मात्र, 

पूछता हूँ मै… कल्पना से एक कदम पहले की बात। 

कल्पना का आविर्भाव किसने किया?

ये मत कहना तुमने किया … 

अगर मैने किया तो कैसे किया?

किस शक्ति ने कल्पना को जिया?

पूजता हूँ उस निराकार को,

कल्पना कराने वाले उस चित्रकार को,

नही… नही वो चित्रकार ‘मैं’ नही,

दरअसल,चित्र … चित्रकार ही है, ‘मैं’ कही भी नहीं।


फिर किसको ‘मैं’ कहते फिरते हो?

कहना पड़ता है इसलिए ‘मैं’ हूँ, न कहूँ तो सबमें हूँ … 

जब कही हलचल न होती तो ‘वो’ हैं…

होती हलचल मे ‘मैं’ हूँ।


मूर्त देखकर भूल मे न पड़ना… वो तो है बहाना …वासनाओं का खजाना,

पूजता हूँ मूर्त के भीतर के भाव को,उस निराकार के ‘साकार’ को।

फिर ‘भाव’ क्या हैं?

उसी हलचल का ठहर जाना ‘भाव’ है,

किसी दर्पण का मचल जाना ‘भाव’ है,

क्योंकि दर्पण है भक्त,सिर्फ नाथ का चित्र बनाता है,

दर्पण के इधर भी हैं नाथ … दर्पण के उधर भी हैं नाथ, 

पथ भी नाथ,पथ प्रदर्शक भी नाथ,पथिक भी नाथ।

भक्त तो साक्षी भाव है… बस देखता है… 

सारी लीलाओं को अपने मे समेटता है,

फिर एक दिन दर्पण टूट जाता है…

पथ,पथिक,पथ प्रदर्शक सबको एक हो जाना होता है,

सारी हलचल कही रुक सी जाती है… 

‘साकार’ स्वरूप अपने ‘निराकार’ को बार-बार दोहराती है।

तभी कहता हूँ … 

ये भी सत्य… वो भी सत्य, 

सिर्फ ‘दक्ष-यज्ञ’ ही है असत्य।

                                                     -Shavi

Thank you for reading! 

I am sure if you re-read it…you’ll discover something. 

Please do comment your favourite line! Jai Shri Hari!