इस संसार में जो कुछ होता है वह सब केवल भगवान की कृपा से होता है। उन महामहिम परमात्मा कि माया ‘अघटन- घटना पटीयसी’ कहलाती है।

भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त नरसिंह मेहता ६०० वर्षों के बाद भी आज भी हमारे दिलों में निवास करते हैं। ऐसी है नरसिंह मेहता जैसी आत्माओं की उपस्थिति। गुजराती भक्ति  के अग्रणी होने के नाते, नरसिंह मेहता ने अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करने और भगवान कृष्ण पर अपने प्यार की बौछार करने के लिए ही लेखन में अपनी यात्रा शुरू की।

नरसिंह मेहता ने हरिजनों के घरों में भजन और कीर्तन आयोजित करके जातिवाद सहित हर बाधा को दूर करते हुए अपने भगवान के प्रेम को दूर-दूर तक फैलाया। हालाँकि पहले तो नागर ब्राह्मणों द्वारा निंदा की गई, एक बार जब उन्होंने भगवान के लिए उनके सत्य और प्रेम को पहचान लिया, तो उन्होंने एक आधुनिक मीराबाई की तरह उनकी महिमा का गायन किया।

उनकी कृतियाँ हुंडी (बॉन्ड) हार माला (माला) पुत्रन विवाह, आख्यान, प्रभातिया, हरि सामे न पाड़ा, झरी न पाड़ा उनके कुछ प्रसिद्ध पद हैं।

यहां प्रस्तुत है उनके जीवन कि एक कथा जिसमें उन्होंने भगवान कृष्ण के नाम एक बांड (हुण्डी) लिखी थी। यह कथा मुझे बहुत अच्छी लगती है इसलिए मैं इसको यहां संकलित कर रहा हूं। इस कथा में बताया गया है किस प्रकार भक्तवत्सल भगवान अपने भक्तों का भार खुद वहन करते हैं।

 यह उनके ही द्वारा रचित एक पद से ली गई है।     प्रस्तुत है यह कथा:- 

स्वार्थमय् संसार में धनवान-धनहीन , दाता-कृपण, विद्वान- मूर्ख,  कुलीन-अकुलिन् एवं सज्जन-दुर्जन का परंपरागत बैर चला आ रहा है।

बात तब की है जब नरसिंह मेहता की पत्नी का शरीर पूरा हुए 9 दिन बीत चुके थे। अब उसका श्राद्ध कराने और उस अवसर पर ब्राह्मणों तथा जाती भाइयों को भोजन कराने की आवश्यकता आ पड़ी थी । परंतु वह भगवान के भरोसे निश्चिंत थे।

उनकी जाति के प्रमुख व्यक्ति उनके पास आते  और सारी जाति को दोनों दिन भोजन कराने पर जोर देते । परंतु नरसिंह राम हर समय ” जैसी परमात्मा की इच्छा ” कह कर  टाल दिया करते थे।

एक दिन प्रात: कालीन सारंगधर नामक एक प्रमुख जाति प्रमुख उनके उपस्थित होते हैं। वह बहुत ही आवेश में बोलते हैं – नरसिंह राम आज तक तुमने जाति में रहकर सब के घर भोजन किया है और आज जब अपने खिलाने का अवसर आ पड़ा तब तुम छिटकना चाहते हो !  ऐसा कदापि नहीं हो सकता ! मैं कह देता हूं कल से 2 दिन तक तुमको जाती भोजन कराने पड़ेगा , इसके लिए चाहे इस घर को बेच दो या अपनी स्त्री के गहनों को ।

सारंगधर की बात सुनकर सरल स्वभाव नरसिंह राम ने भगवान के नाम का जप करते हुए मस्तक् हिलाकर हां कर दिया बस फिर क्या था , वह वापस अपने घर लौट गए।

सारंगधर के चले जाने पर भक्तराज सोचने लगे मैंने हां तो कर दिया ,  किंतु अब इसको पूर्ण करना तो भगवान कृष्ण के अधीन है । जैसे इनकी इच्छा होगी करेंगे , व्यर्थ चिंता करके समय का नाश करने में क्या लाभ है यह् सोच कर वे भगवान के ध्यान में मग्न हो गए।

इधर उन्हीं के गांव में चौराहे पर कुछ लोग बैठे थे। उसी समय चार यात्री वहां आए और उन्होंने नम्रता पूर्वक पूछा :- “भाइयों इस नगर में ऐसा धनवान कौन व्यापारी है जो हमारे 700 ₹   लेकर द्वारिका कि एक हुण्डी (bond) लिख दे?” (in those times there were no banks , so to save money from thieves , people will take with them bond as a money for exchange)

यात्रियों की बात सुनकर एक ईर्ष्यालु नागर ने उत्तर दिया “आप लोग नरसिंह मेहता के घर चले जाइए द्वारिका में उनकी बहुत बड़ी दुकान है , हुंडी वहां स्वीकृत हो जाएगी आप लोगों  को अन्य स्थान में ऐसे सुविधा नहीं मिलेगी ।”

दो, तीन और जनों ने हां में हां मिला दी। बेचारे यात्रियों को विश्वास हो गया और वे मेहता जी के घर जा पहुंचे।

भक्तराज ने अभिवादन का उत्तर देने के बाद उन्हें आसन  प्रदान कर उनका यथोचित सत्कार किया और फिर आगमन का कारण पूछा।

  • To Be Continued…….

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Ankit Vyas

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