जय श्री हरि 🙏🌺🙏

आज सुबह मेरी एक पुरानी सहकर्मी का प्यारा सा संदेश मिला, वो उम्र में मुझसे काफ़ी बड़ी हैं, मेरे लिए वो हमेशा शिक्षक की तरह ही रहीं, यहाँ तक की मुझे याद ही नहीं था कि वो मेरी सहकर्मी रहीं थीं।

वो हिंदी की प्रोफ़ेसर हैं, और एक प्यारी इंसान।

प्रस्तुत है, डॉक्टर पूर्णिमा जोशी द्वारा रचित,

🍁मम्मी का कटोरदान 🍁

जब हम छोटे थे तब मम्मी रोटियां एक स्टील के कटोरदान में रखा करती थीं।
रोटी रखने से पहले कटोरदान में एक कपडा बिछाती, वो कपडा भी उनकी पुरानी सूती साड़ी से फाड़ा हुआ होता था।
वो कपडा गर्म रोटियों की भाप से गिरने वाले पानी को सोख लेता था , जैसे मम्मी की साड़ी का पल्लू सोख लेता था, हमारे माथे पे आया पसीना,
कभी धूप में छाँव बन जाता कभी ठण्ड में कानों को गर्माहट दे जाता ।
कभी कपडा न होता तो अख़बार भी बिछा लेती थीं मम्मी…..
लेकिन कुछ बिछातीं ज़रूर थीं।
समय बीतता गया और हम बड़े हुए,
एक बार दीपावली पर हम मम्मी के साथ बाजार गए
तो बर्तनो की दुकान पर देखा केसरोल …..चमचमाते लाल रंग का, बाहर से प्लास्टिक और अंदर से स्टील का था।
दुकानदार ने कहा ये लेटेस्ट है, इसमें रोटियां गर्म रहती है।
हम तो मम्मी के पीछे ही पड़ गए अब तो इसी में रोटियां रखी जाएँगी , मम्मी की कहाँ चलती थी हमारी ज़िद के आगे,
अब रोटीयां कैसेरोल में रखी जाने लगी।
कटोरदान में अब पापड़ रखने लगी थीं मम्मी।
अगले महीने, मम्मी की एक सहेली ने ,पापड़ मंगवा के दिए पर, वो तो बहुत बड़े थे, तो कटोरदान में फिट ही नहीं हो पIये। इसलिए उन्हें एक दूसरे बड़े डब्बे में रखा गया….
और अब कटोरदान में मम्मी ने परथन रख लिया।
परथन माने सूखा आटा जो रोटी को चिपकने नहीं देता। जैसे जैसे समय बीतता गया
कटोरदान की भूमिका भी बदलती गई पर वो मायूस न हुआ जैसा था वैसा ही रहा बस ढलता गया नयी भूमिकाओं में ।
कुछ और समय बीता,
मेरी शादी हो गयी और मैं एक नए शहर में आ गयी।
मम्मी ने मुझे बहुत सुन्दर कीमती और नयी चीज़ें दी अपनी गृहस्थी को सजाने के लिए…..
पर मुझे हमेशा कुछ कमी लगती थी।
एक बार जब गर्मी की छुटियों में मम्मी से मिलने गई, तो मम्मी ने मुझे एक कैसेरोल का सेट दिआ,
मैने कहा मुझे ये नहीं वो कटोरदान चाहिए।
मम्मी हंस दी ….
उसका क्या करेगी ?
ये ले के जा लेटेस्ट है।
मैंने कहा हाँ ठीक है पर वो भी ।
मम्मी मुस्कुरा दी और पलोथन निकाल कर कटोरदान धोने लगी ,उसे अपनी साड़ी के पल्लू से सुखाया और उसमे लडडू रख कर मेरे बैग में
में रख दिए ।
अब खुश ।
मैने कहा,-” हाँ “।
मै उस कटोरदान को बहुत काम में लेती हूँ।
सच कहूँ तो अकेलापन कुछ कम हुआ
कभी बेसन के लड्डू भर के रखती हूँ ,कभी शक्कर पारे
कभी उसमें ढोकला बनाती हूँ।
कभी सूजी का हलवा रखती
और कभी दही जमाती हूँ।
कभी कभी पापड़ भी रखती हूँ I
एक दिन बच्चों की जिद्द पे उसी में केक भी बना डाला।
नित नयी भूमिका मैं ढल जाता है मम्मी का ये कटोरदान,
यहाँ आने बाद मुझे मम्मी की बहुत याद आती थी ,पर मैं कहती नहीं थी कि मम्मी को दुःख होगा।
कभी कभी सोचती हूँ, क्या इस कटोरदान को भी मम्मी की याद आती होगी ?
ये भी तो मेरी तरह मम्मी के हाथों के स्पर्श को तरसता होगा ?
आखिर इसने भी तो अपनी लगभग आधी ज़िन्दगी उनके साथ बिताई है ।
बस हम दोनों ऐसे ही अक्सर मम्मी को याद कर लेते हैं
एक दूसरे को छू कर मम्मी का प्यार महसूस कर लेते है।
बस ऐसे ही एक दूसरे को सहारा दे देते हैं …..
मै और मम्मी का कटोरदान।

ऐसा कटोरदान शायद हर बेटी के पास होगा।
…….✍

Written by Dr. Poornima Joshi

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