माँ ललिता ही कृष्ण हैं 1“माँ ललिता ही कृष्ण हैं ”

मेरी आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ वर्ष २०१७ में स्वामीजी की पुस्तक “A Million Thoughts” पढ़ने के साथ हुआ।

“If Truth Be Told” पढ़कर और स्वामीजी के You tube प्रवचन सुन कर मुझे ज्ञात हुआ कि स्वामीजी “शाक्त-साधक” हैं। 

तब से यह प्रश्न मेरे जिज्ञासु मन में उभरता रहता कि “श्री बद्रिका आश्रम” में श्री हरि का विग्रह क्यों है। मैं अपनी अल्प बुद्धि से सोचता की देवी विग्रह के अत्याधिक नियम और ऊर्जा होती होंगी, संभवतः इसलिए सदैव कृपालु और हर्षित श्री हरि का विग्रह परम पूज्यनीय स्वामीजी ने आश्रम में स्थापित किया है। ऐसे संकेत स्वामीजी ने अपने प्रवचन में भी दिये हैं।

परन्तु मेरा चित्त इसका अनुसंधान कर रहा था। 

यह भी ज्ञात हुआ की बाल्यावस्था में स्वामीजी श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहते थे एवं सन्यास उपरांत वह आध्याशक्ति की साधना में लीन हैं। 

वर्ष २०१८ – २० में आध्यात्मिक एवं तांत्रिक पुस्तकों का संकलन प्रारम्भ किया। 

अति प्रयास से “तंत्रराजतन्त्रम” प्राप्त हुई । एक रात्रि इन्हीं विचारों में लीन था; देवी, श्री हरि !!! और मस्तिष्क में अत्यधिक ऊर्जा का संचारण हो रहा था।

तंत्रराजतन्त्रम एक गूढ़ ग्रन्थ है, अधिक समझ नहीं आ रहा था किंतु दैवीय कृपा से “ललिता विध्या का गोपाल स्वरूप पटल” अचानक ही मेरे सामने प्रस्तुत हो गया। मेरा मन विस्मय और आशीष का मिश्रित अनुभव कर रहा था। 

” कदाचिद् आध्या ललिता पुरुष रूप कृष्ण विग्रह बनीं हैं। गोपियों के रूप में भी वही अपनी शक्तियों के साथ घिरी रहती हैं।” तंत्रराजतन्त्रम से साभार। 

इसके बाद इस अद्भुत लीला का विस्तार से उल्लेख है।

यह ज्ञात होने के बाद, स्वामीजी द्वारा श्री हरि की प्राण प्रतिष्ठा का रहस्य भी मेरी समझ में आ गया। यह स्वामीजी ने ही मेरी बुद्धि को प्रेरित कर ज्ञान दिया है।

मैं श्री कृष्ण के विभिन्न चित्र देखता रहता हूँ । उनके श्रृंगार, चरणों में महावर, और श्री हरि (बद्रिका आश्रम) के मुखमण्डल में साक्षात माँ त्रिपुरसुन्दरी, सुदर्शनचक्र में श्रीयंत्र का रहस्य मेरे मन को प्रफुल्लित कर देता है। भक्ति के सागर में डुबकी स्वतः ही लग जाती है।

स्मरण हुआ वर्ष २०१६ में वृंदावन में गोपेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन किये थे। स्वयं महादेव माँ ललिताम्बिका (श्रीकृष्ण) से मिलने गोपी का रूप धर कर वृंदावन आये थे ।

अब सब वैज्ञानिक अनुसंधान में प्रमाणित तथ्य की भांति मेरे मस्तिष्क एवं हृदय में निवास कर रहा है।

मैं अति अभिभूत हूँ अपने गुरु महाराज परम पूज्यनीय श्री ॐ स्वामीजी की निरंतर कृपा के लिए।

दिनांक २० जून २०२१, प्रातः “श्रीविध्या नवावरण सपर्या” (श्रीद्वारकाधीश संस्कृत अकादमी) द्वारका, जिसका मैं पूजन में उपयोग करता हूँ, का पिछला आवरण हट गया। लगभग तीन वर्ष से मैं इस पुस्तक का उपयोग/अध्ययन कर रहा हूँ। आवरण २० जून २०२१ को हटा।

  • भगवान द्वारकाधीश के सम्पूर्ण श्रंगार युक्त चित्र के नीचे अंकित है “कदाचिद् आध्या ललिता पुंरूपा कृष्ण विग्रहा”। ( संकलित चित्र देखें )

स्वामीजी ने देवी दर्शन के विस्तृत अनुभव वाले प्रवचन में माँ के चक्रधर स्वरूप के दर्शन का भी उल्लेख किया है । यह प्रवचन मैंने सन् २०१७ में सुना था परंतु स्मरण नहीं था । दिनांक २१ जून २०२१ को ये प्रवचन पुनः मेरे सामने प्रस्तुत हो गया ।

यह साक्षात स्वामीजी का स्नेह और आशीर्वाद है। मेरा मन मयूर जैसे काले बादल देख नृत्य कर रहा था (भक्तचित्तकेकिघनाघना)।

यह माँ त्रिपुरसुन्दरी का सांकेतिक आदेश था की मैं इस दैवीय घटनाक्रम/अनुभव को अपने श्री बद्रिका आश्रम परिवार के साथ साझा करूँ।

इस सत्य का अनुभव मेरे गुरु की चरण पादुकाओं को समर्पित है।

इसका प्रकाशन वट पूर्णिमा के पावन पर्व पर हो रहा है।       

# श्रीललिता सहस्त्रनाम्   # पूर्णिमा   # हरे कृष्णा     

जय श्री हरी

श्री मात्रे नमः

नमो नमः श्री गुरु पदुकाभ्याम

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Rakesh Om

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