यूंही कुछ बाते…

 

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आए हो तो जाओगे जरूर

रोना किसलिए है?

अगर जाने पर कुछ आंखे नम हो जाए

तो जाना भी एक उत्सव हे!

ऐसे जियो की जीते-जी चारो-ओर

सिर्फ रोशनी बिखर रहि हो।

गम के घने बादलों को 

चलते चलते मिटा रहि हो।

क्या पाना है, क्या नहीं पाया

छोडो इस चिंता को…

क्या कर सकते हो और कितना

बस उसे ध्यान मेंं रखो। 

अपने रिश्तों को अच्छे से निभाओ

अपना प्यार सबको बांटो।

कोई भी मिलने के बाद दुखी ना हो—

बस इतना करना सीखो।

जिंदगी को हंसते-खेलते बिताओ

थोड़ा सा बच्चा बनो।

हृदय मे संतुष्टि और 

कर्मो मेंं अनासक्ति अपनाओ।

अपने और दूसरों की गलतियों से सीखो

और आगे बढ़ते चलो…

कभी डर जाओ या खो जाओ 

तो ठहरो। स्थिर हो के

समझना सीखो।

जीने की यही परिभाषा है:

जब मौत का डर चला जाए,

और जीने मे आनंद आए,

तो तुम अच्छे से जी रहे हो!

P.S: I am slightly revising the poem. The previous one had some spelling mistake. Amruta Di helped me with the spelling. This version is edited by Her. I am thankful to you, Di.🙂

Thank you.
Image Credit: istockphoto.

 

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Alok Singha

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