क्यों बैरागी बनकर बैठा है तू ?

सबकुछ त्यागकर क्या समाधी में मग्न हो गया है तू ?

शरीर पर भस्म लगाकर क्या शमशान का निवासी हो गया है तू ??

कैलाश की अनंत गहराई में कहां ढूंढू मैं तुम्हें ?

मैं कोई पार्वती नहिं , जो कठोर तप करके तुझे प्रसन्न कर सकूं ।

मुझे तेरा ये रौद्र रूप पसंद नहिं ।

तू विष्णू बनकर तेरी सुंदर छबी के साथ मेरे सामने आजा ।

मैंने तेरे इसी स्वरूप पर प्रेम किया है ।

तेरा मनोहर रूप मैं अपनी आंखों में समाना चाहती हूं ।

तेरा प्रसन्न वदन देखकर मुझे अतीव आनंद मिलता है ।

जब भी आता है तू , बासुरी की मधूर धून बजाकर , मेरे मन का कण कण झुमने को करता है ।

क्षिरसिंधू में विश्राम करता तू , मेरे चित का चितचोर है तू ।

तुझे मैं श्रीहरी के रूप में हि देखती हूं । तेरी पूजा करती हूं ।

भावनाओं के बहाव में मुझे बहने मत दे ।

तेरे विरह की अग्नी में मुझे ऐसे जला मत ।

आकर अपने सुंदर स्वरूप का प्राकट्य कर दे ।

अपनी मीरा को अपने स्वरूप में एकरूप कर ले ।

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Amruta

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