प्रिय मित्रों, आशा है आप सभी स्वस्थ व सुखी होंगे। पिछले पोस्ट में मैने लिख तो दिया- श्रीमद भगवद गीता- मेरे नजरिये से, परन्तु फिर बाद में जब मैने गहराई से विचारा, तो मैं सोच में पड़ गई कि मेरी भला क्या हस्ती जो मैं भगवान के मुखारबिंद से निकले हुए शब्दों का अर्थ कर सकूँ। बड़े-बड़े योगी महात्माओं के भी ये बस की बात नहीं, तो मैं भला किस श्रेणी में हूँ? भगवान से प्रार्थना की, क्योंकि मैने जीवन में पहली बार कुछ लिखा है तो जरूर यह आप ही का आशीर्वाद होगा।

श्रीमद भगवद गीता 8

गीता भगवान द्वारा रचित गीत है, जैसे जीवन भी एक गीत की भांति ही है। हर कोई इसे अलग-अलग तरह से गाता है। कोई इसे प्रेम से गाता है, कोई नियम से, कोई दुख से गाते हैं, कोई खुशी से, कई जानकार भी नहीं गाते और कईयों को गाना नहीं आता। भगवान ने वाणी, मन, इन्द्रियां, हृदय सभी को दिया है उसका उपयोग कोई कैसा करता है ये तो उसी पर निर्भर है।

यहाँ एक बात मैं स्पष्ट कर दूँ, की ये मेरे शब्द नहीं, मेरे परम पूज्य गुरूजी के वचन हैं जिन्हें मैं दोहरा रही हूँ।

मैंने सुना है कि हर बात के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। महाभारत में भी हर पात्र अपना-अपना युद्ध, अपनी-अपनी महाभारत स्वयं लिख रहा था। सर्व प्रथम, सभी प्रमुख पात्रों का परिचय व उनके युद्ध में भाग लेने के कारण का संक्षिप्त वर्णन करना चाहती हूँ।

महाभारत के युद्ध के पीछे भी कारण था और वह था लालच और मोह, धृतराष्ट्र को अपने राज्य और अपने पुत्र से था। उसके लिए उन्होंने धर्म तक का रास्ता छोड़ दिया जबकि उन्हें पता था कि धर्म और विजय तो वहीं है जहां श्री कृष्ण है। फिर भी वह युद्ध के लिए आतुर थे।

दुर्योधन

दुर्योधन पूरा साम्राज्य चाहता था। वह पांडवों से बहुत ईर्ष्या करता था और इसी ईर्ष्या के कारण युद्ध चाहता था, जबकि भगवान स्वयं उसके पास शांति दूत बन कर शान्ति का प्रस्ताव लेकर आए। परंतु अपनी हठ और अहंकार के कारण उसने उनका अपमान कर उसे भी ठुकरा दिया। श्रीमद भगवद गीता 9उसकी ज़िद और उसका घमंड ही उसकी मति को भ्रष्ट किए हुए था। वह तो इतना अधम बुद्धि का था, कि भगवान को ही कारागार में डालने चला था । वोह कहते हैं ना  ‘जब नाश मनुष्य पर छाता है पहले विवेक मर जाता है ’ जबकि भगवान ने उसे उसका अंत तक दिखा दिया था। परंतु वह अपने घमंड के कारण अपने हठ पर अडिग रहा।

भीष्म 

भीष्म के युद्ध में सम्मिलित  होने का कारण उनकी भीष्म प्रतिज्ञा थी, जो उन्होंने युवावस्था में अपने पिता को प्रसन्न करते समय ली थी। जब उनके पिता किसी स्त्री के मोह में पड़कर दुख में डूबे हुए थे, तब उस स्त्री को भीष्म ने वचन दिया की वह कभी विवाह नहीं करेंगे और वह अपने पिता के अन्य संतानों की तथा हस्तिनापुर की मरते दम तक रक्षा करेंगे। उस समय उन्होंने नहीं सोचा था कि उन्हें ऐसी स्थिति का भी सामना करना पड़ेगा, जिसमें उनके ही पौत्र आमने-सामने शत्रुओं की भांति खड़े होंगे। परंतु यह उनकी प्रतिज्ञा ही थी जो हस्तिनापुर के पक्ष में यह जानते हुए भी युद्ध कर रहे थे, कि वे धर्म के साथ नहीं बल्कि धर्म के विरुद्ध युद्ध कर रहे हैं। उन्हें पता था जहां श्री कृष्ण हैं, विजय वहीं है।

द्रोणाचार्य 

द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों के गुरु थे परंतु वह भी पूरी तरह से हस्तिनापुर के प्रति समर्पित थे और उन्हें भी कौरवों के पक्ष में मजबूरी से युद्ध करना पड़ रहा था।

शिखंडी

शिखंडी, पूर्व जनम में, अम्बा नाम की एक युवती थी जिसे भीष्म उसकी इच्छा के विरुद्ध अपहरण कर लाए थे। बाद में जब इस युवती ने उनसे विवाह करने की इच्छा रखी तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा के कारण मना कर दिया। इसी अपमान से दुखी होकर, उसने बहुत घोर तप-साधना की और अपने लिए वरदान मांगा कि वह भीष्म की मृत्यु का कारण बने। अपने अगले जन्म में वही अम्बा शिखंडी बनकर, युद्ध के मैदान में भीष्म की मृत्यु का कारण बनी।

द्रौपदी

द्रौपदी पांडवों की पत्नी थी, श्रीमद भगवद गीता 10जिसका अपमान दुर्योधन ने भरी सभा में उसे अपमानित और नग्न करने के प्रयास से किया था, परंतु श्री कृष्ण की रक्षा करने से वह अपना सतीत्व को बचा सकीं। वही इस युद्ध का सबसे बड़ा कारण बनीं, जो इस युद्ध से अपने अपमान का बदला लेना चाहती थी।

धृष्टद्युम्न 

धृष्टद्युम्न द्रौपदी का भाई था जो कौरवों से अपनी बहन के अपमान का प्रतिशोध लेना चाहता था।

पांडव 

पांडव अपना न्याय सांगत अधिकार अपना राज्य और अपनी पत्नी के अपमान का प्रतिशोध लेना चाहते थे, परन्तु भगवान के समझाने पर वह समझौते के लिया मान गए। भगवान ने उनके पक्ष में शांति दूत बनकर दुर्योधन से उनके लिए सिर्फ 5 ग्राम ही मांगे थे, परंतु उसने तो सुई की नोक के बराबर भी भूमि देने से इंकार कर दिया। फिर पांडव क्या करते? कई बार अपमान के घूंट पीकर भी वे शांति से रहना चाहते थे, परंतु दुर्योधन ने उनके लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ा था। जब युद्ध की ठन ही गई तो पांडव भी तो महावीर योद्धा ही थे और कृष्ण उनके पक्ष में थे, यानी धर्म उनके पक्ष में ।

इसी प्रकार अन्य महारथी भी किसी न किसी कारण इस युद्ध का हिस्सा बनना चाहते थे, क्योंकि यह अपने आप में एक बड़ा भयंकर महायुद्ध था जहां हर कोई अपनी-अपनी उपस्थिति दर्ज करवा कर इतिहास में अमर होना चाहता था। महाभारत के प्रत्येक पात्र की तरह हम सबका भी अंतर द्वन्द हमारी व्यक्तिगत दुविधा है, प्रत्येक मनुष्य अपने सत्य के अनुरूप संघर्ष कर रहा है, एक युद्ध लिख रहा है, एक महाभारत रच रहा है।

शीघ्र फिर भेंट होगी।

ॐ श्री कृष्णार्पणमस्तु।

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Chanchal Om Sharma

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