श्री हरि की छवि 2 ||श्री हरि के चरण कमलो में||

कृपया करें प्रभु किंतु मैं आपके बारे में या आपके संदर्भ में लिखने मे असमर्थ हुँ|

लेकिन वो भावना एक क्षण को भी साथ ना छोड़े! 

प्रभु की मुरत, प्रभु की सुरत नयनों के आगे निरंतर छलकती रही, एक सुंदर वीणा के राग की तरह| कभी क्षीण कभी प्रबल, प्रभु की सुंदर सुरत आँखों से एक क्षण भी औजल ना होतीं|

“ठीक हैं प्रभु, वाक्य आपके होंगे, और जो मेरे भाव हैं, वो वह तो आप ही की आध्यात्मिक भेट हैं|”

||श्री हरि का आगमन||

प्रतिदिन प्रभु के प्रातः दर्शनों से सुबह की शुरुआत होतीं| जैसे रात्रि में आँखें मुंदने से पहले प्रभु के दर्शनों की प्रतिक्षा और अभिलाषा दोनों ही घर कर लेती हैं|

दूरभाष के पट पर श्री हरि के आने की प्रतिक्षा रहती|

एक बार तो युं हुआ के जैसे प्रभु के दर्शन आँखों से जाते ही नहीं, प्रतिक्षा जैसे निरंतर समगम्य में परिवर्तित हो गयी|

रात्रि की प्रतिक्षा क्या और भोर की भेट क्या, अब तो जैसे श्री हरि के आशीर्वाद से उनके ऐक्य की प्राप्ति हो गयी|

प्रातः काल स्नान के बाद, अपने मंदिर की और दौड़ के जाना और सुबह का ध्यान और संगीत दोनों प्रभु को भेट करना| कुछ दिनों पहले गुरू पूर्णिमा पर आश्रम में एक भजन सुना, बस उसे ही अपनी दिनचर्या में संगठित कर लिया. दो मिनट का प्रणायम, फ़िर ऊँ का उच्चारण हरे कृष्ण का महामंत्र और उस क्षण की प्रतिक्षा जब स्वामी जी के लिए वो भजं और श्री हरि के मुखरविंद पर ध्यान|

प्रातः काल के ध्यान का अंतिम क्रम और सबसे बहुप्रतीक्षित भी|प्रभु की छवि पर ध्यान|

श्री हरि की छवि 3

||श्री हरि की छवि||

भजं की लय से रोम रोम हुई काया

आँखे मुंदे बैठी

श्री हरि से मिलन को

श्री हरि की छवि

मनमोहक अति सुंदर

सुंदर मुकुट सर पर विराजे

श्याम रंग की अद्भुत शीला पर

अंकित प्रभु की काया 

शीला-आचार्य के हाथों की अद्भुत रचना

शीला आचार्य की कला

या प्रभु की असीम कृपा की उनपर छाया

मुकुट जैसे चतुर्भुज के गौरव् का दर्शन

मुकुट का शिखर और उसका कलश

मंदिर और मंदिर में मूरत

जैसे वो ही हैं दोनों

शिल्प-शास्त्र का सार और तत्व

श्री हरि के मुकुट की छवि में

परमपिता परमेश्वर श्रीनारायण के माथे पर

चंदन का तिलक

शीतलता देता मस्तिष्क को

सिंदूर टिक्का सहज ही

पोषण देता

मेरे व्यक्तित्व को

मातृ-पितृ दर्शन एक ही क्षण में

श्रीनारायण के इस विग्रह में

माँ की कोमलता

पिता का दुलार

हमारे स्वामी का ही तो अंश

श्याम शीला पर अंकित प्रभु की सूरत

नवनीत जैसा कोमल 

झरने जैसा सुंदर

माँ की गर्भ जैसा पोषक

आँखे मुंदे श्री हरि की छवि निहारते

कभी अश्रु धार बहे

कभी खिले मुस्कान की खिलखिलाहट

प्रभु की बोहे इतनी विशाल

जैसे समाये सृष्टि की सारी चिंता और संताप

पर फिर भी ऐसे हैं शांत

जैसे समुद्र सी शांति

आकाश सी अनंत ख्याति

माथे का तिलक मुझे अपनी और् आकृषित करता

चंदन तिलक भेजे अनंत ज्योतिर्मय प्रकाश

सिंदूर टिक्का हृदय में भरे माँ की लालिमा का उगते सूरज जैसा प्रकाश 

प्रभु के मुखरविंद को निहारते समय

उनके श्यामा-वरण शीला की काया

आँखो को निरंतर शीतलता प्रदान करती

प्रभु की आँखे

अद्वितीय स्वपन की सुंदरता उनमे उतरी हुई

कमल के पुष्प् की पंखुड़ी जैसी कोमल् और तिक्षणं

चाँद की शीतलता उनमे समाई हुई

ध्यान की चरम सीमा अपने में लिए वे आँखें

भक्तों के लिये प्रेम लिये प्रभु की आँखें

भक्तो की पीड़ा लिए प्रभु की आँखे

प्रभु की आँखो मैं इस शृष्टि और

यहाँ से परे भ्रमाँड के भेद

जीतना उनमे देखने की चेष्ठा उतनी अनंत प्रभु की आँखे

कहने को ये सब किंतु

कैवल् प्रेम श्री नारायां के नयन

उनकी बाई नयन पर पड़े छोटा सा चिन्ह

जैसे स्वामी जी के बाई नयन में छोटा सा तिल

प्रभु के गाल एक बचे के भरे भरे दो गाल

डर लगे कहीं अपने ही भार से वो कोमल् गाल गिर न जाए

कैसी विचित्र विडंबना

किंतु प्रभु के गालों की छवि इतनी कोमल् 

औस की भरी बूँद, छेड़ो तो कहीं गिर ना जाये

ऐसी ही तों हैं हमारे स्वामी के गाल

मन मूर्ख पर ये समझ न पाए

मन चाहें के प्रभु के मुखरविंद का दिव्य रस ले पर आँखो से सहा ना जाये

परिणाम स्वरूप जब श्री हरि के दर्शन हुए थे और रघु स्वामी ने अभिषेक पर उनके गाल को दही से सहलया था एक तिक्षण पीड़ा हुई थी इतने कोमल् गालों पर इतने तीव्र हाथ|

पर मन जनता हैं अपनी मुड़ता

हृदय जनता हैं अपनी भावना

बस आँखें बंद कर ली थी उस क्षण

श्री नारायण पर्वत के जैसे स्थित

उन्हें क्या पीड़ा|

प्रभु की नासिका,

प्रभु की नासिका तीव्र उनके शिशु जैसे मुख को एक सम्राट की गरिमा प्रदान करती

प्रभु का मुख 

शिशु की सहजता 

माँ की कोमलता

सम्राट सी भव्यता

विष्णु नासिका शृष्टि का विधान

नियंता की नासिका दर्शाती शृष्टि का सिद्धांत

उसकी असीम शक्ति प्रकाम्य

प्रभु के होंठ जैसे बालक के भरे भरे होंठ

माँ के दुग्ध का पालन पोषण उनमे

प्रभु के होंठो के कोने की धीमी निरंतर हँसी

जैसे समस्त शृष्टि की सतत् प्रसन्नता और सौभाग्य

प्रभु की चिबुक, उनकी ठुड्डी जैसे एक बचे की ठुड्डी

उसे देख बस सरलता से उसे सहलाने का मन हो

जैसे प्रभु एक शिशु की तरह मुस्कुरा दें बस||

प्रभु की श्यामल काया शीला की तो हैं किंतु लगता हैं की साक्षात् प्रभु सामने हैं बस प्रभु की कृपा हो जाए के वो हमारे समक्ष अपने अद्भुत चतुर्भुज स्वरूप में आ जाएं|

जिस दिन प्रभु के छवि का दर्शन शांति प्रदान न कर हृदय में प्रेम और मिलन की उत्सुकता का प्रवाह करें मुखसे हरे कृष्णा महामंत्र स्वतः ही आ जाता हैं जैसे प्रभु से संवाद हो गया|

श्री हरि की छवि 4

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Tanvi Sharma

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