संत गोरा कुम्हार जी वारकरी संप्रदाय के संत थे । वे विठ्ठल के परमभक्त थे । तेर नामक नगरी में कालेश्वर ग्राम दैवत की उनके घर उपासना चलती । उनके पिता का नाम माधव और माता का नाम रूक्मिणी था । माधवबुवा को आठ पुत्र हुये । किंतु सभी पुत्र मर गये । उनको कालेश्वर की स्मशानभूमी में गोरी में दफन किया गया । एक दिन परमात्मा पांडुरंग ब्राह्मण का वेश लेकर उनके घर आये । माधवबुवा को दुखी देखकर उनके दुख का कारण पुछा । माधवबुवा बोले ,“हमारे आठ पुत्र जिवित नहिं रहे इसिलिए हम दुखी है ।” ब्राह्मण ने जहां पुत्रों को दफन किया उस स्थान चलने को कहा । माधवबुवा उन्हें कालेश्वर के स्मशान में ले गये । आठ पुत्रों को जहां दफन किया वो स्थान दिखाया । ब्राह्मण ने सभी पुत्रों के प्रेत बाहर निकालने को कहा । माधवबुवा ने पुत्रों के प्रेत बाहर निकाले । ब्राह्मण ने अपनी अमृत दृष्टी से उनकी ओर देखा और सभी को स्पर्श किया । तभी सभी पुत्र जिवित हो उठे और स्वर्ग की ओर जाने लगे । ब्राह्मण ने आठवे बालक को रोका और अपने हाथों से माधवबुवा को सौंप दिया । गोरी से निकाला इसिलिए उसका नाम “गोरोबा” रखा ।

गोरोबा के मन पर बचपन से भगवद्भक्ती के संस्कार हुये । जब गोरोबा पंढरपूर विठ्ठल दर्शन के लिए जाते तब उन्हें वहां के सिध्द पुरूषों के दर्शन भी होते । गोरोबा जीं का प्रपंच परमार्थमय बन गया । पूजा , नामस्मरण , ध्यान आदि में उनका समय व्यतीत होता । दिनभर वे काम करते समय ईश्वर चिंतन में मग्न रहते ।

एक दिन गोरोबा जी पैरों से गिली मिट्टी एकत्रित कर रहे थे । उनका ध्यान विठ्ठल चरणों पर लगा था । पांडुरंग के नामस्मरण में वे स्वयं का देहभान भूल गये । शरीर से काम चल रहा था किंतु मन तो परमात्मा में लीन हो चुका था । उसी वक्त उनकी पत्नी बाहर पानी भरने जाने लगी । उनका छोटा बच्चा बाहर खेल रहा था । पत्नी ने गोरोबा जीं को बच्चे का ध्यान रखने कहा और चली गयी । गोरोबा जी तो अपने विठ्ठल के स्मरण में रम गये थे । उन्हें आसपास के वातावरण का ध्यान नहिं था । पैरों से वे मिट्टी एकत्रित करने का काम कर रहे थे और मुख से ईश्वर का नामस्मरण । उनका छोटा बच्चा उनके पास आया । खेल खेल में अपने पिता के पैरों को पकडकर खडा होने की कोशिश करने लगा । उसका तोल गया और वो मिट्टी में गिर गया । मिट्टी रौंदते समय पांडुरंग के भजन में मग्न होने के कारण बच्चे का रोना भी उन्हें सुनाई नहीं दिया । गोरोबा जी आंखे बंद करके भाव समाधी में थे । देहव्रुत्ती शुन्य दशा में विठ्ठल नाम में दंग थे । वे मिट्टी के साथ साथ अपने बच्चे को भी पैरों से कुचलने लगे । उसका जो परीणाम होना था वो हो गया । उस बालक के प्राण अनंत में विलीन हो गये । परमेश्वर भक्ती में लीन गोरोबा जीं को बालक स्पर्श की जाणीव भी नहिं हुयी ।

पानी भरकर आने के उपरांत उसकी पत्नी बच्चे को ढूंढने लगी । बालक दिखाई नहीं देनेपर वह गोरा कुम्हार के पास गई । इतने में उसकी दृष्टि कीचड में गई, कीचड रक्त से लाल हुआ देखकर उसे समझमें आया कि बालक रौंदा गया है । वह जोर से चीख पडी और अपने पतिपर बहुत क्रोध किया । अनजाने में हुए इस कृत्य का प्रायश्चित समझकर गोरा कुम्हारने अपने दोनों हाथ तोड डाले । उसी कारण उसका कुंभकार का व्यवसाय बैठ गया । तब भगवान विठ्ठल रखुमाई मजदूर बनकर उनके घर में आकर रहने लगे । पुन: उसका कुम्हार का व्यवसाय फलने फूलने लगा ।

कुछ दिनों बाद आषाढी एकादशी आयी । श्री ज्ञानेश्वर जी और श्री नामदेव जी यह संत मंडली पंढरपूर जाने निकली । मार्ग में तेर गांव की में आकर श्री ज्ञानेश्वरजी ने गोरा कुम्हार तथा उसकी पत्नी को पंढरपुर में अपने साथ लेकर गए । वहां नामदेवजी का कीर्तन हुआ । ज्ञानेश्वरजी के समेत सर्व संतमंडली कीर्तन सुनने बैठी । गोरा कुम्हार भी अपने पत्नी के साथ कीर्तन सुनने बैठे । कीर्तन के समय लोग हाथ ऊपर उठाकर तालियां बजाने लगे । विठ्ठल नाम का जयकार करने लगे, उस समय गोरा कुम्हारने भी अपने लूले हाथ अचानक ऊपर किए । तब उस लूले हाथों को भी हाथ आ गए । यह देखकर संतमंडली हर्षित हुई । सर्व लोगों ने पांडुरंग का जयघोष किया ।

गोरा कुम्हार की पत्नी ने श्री विठ्ठल से दया की भीख मांगी ।” हे पंढरीनाथ, मेरा बच्चा पति के चरणोंतले रौंदा गया; मैं बच्चे के बिना दुःखी हो गई हूं । हे विठ्ठल, मुझपर दया करो । मुझे मेरा बच्चा दो ।” पंढरीनाथने उसकी विनती सुनी । कीचड में रौंदा गया बच्चा रेंगते-रेंगते सभा से उसके पास आते हुए उसे दिखा । उसने जाकर बच्चे को अपनी गोदी में लिया । 

संत गोरा कुम्हार जी ने जीवनभर विठ्ठल को अपना सबकुछ माना । उन्होंने भक्ती और नामस्मरण द्वारा विठ्ठल प्राप्ती की । स्वतः विठ्ठल उनके घर कुम्हार का काम करने आये । उनकी उपजिविका का प्रबंध किया । उनकी हर प्रकार से मदत करके अंततः पारमार्थिक सुख का धनी बनाया । एकनिष्ठ विठ्ठल भक्त संत गोरा कुम्हार जीं को मेरा प्रणाम 🙏

देवा तुझा मी कुंभार । नासीं पापाचें डोंगर ॥ 

ऐशा संतप्ते हो जाती । घडे साधूची संगती ॥ 

पूर्ण कृपा भगवंताची । गोरा कुंभार मागे हेंचि ॥ 

भावार्थ : हे प्रभो , मैं आपका कुम्हार हूं । आपके लिए कार्य करता हूं । आपका नामस्मरण करता हूं । आपकी सेवा करते करते मेरे पापों का पहाड तोडता हूं । आपकी पूर्ण कृपा के अतिरिक्त गोरा कुम्हार आपसे कुछ नहिं मांगता ।

संत गोरा कुंभार माहिती