आज कल के भाग दौड़ भरे जीवन में अधिकतर व्यक्तियों का जीवन सतही हो गया है l मेरी दृष्टि में सतही जीवन जीना भ्रमांड, प्रकृति एवं इश्वर (यदि आपको उसकी अनुभूती हुयी है तो) का अपमान है l जीवन को पूर्णता और समग्रता से जीना ही सच्ची आस्था है l हम सभी किस भी क्षण में पूर्णता से नहीं होते, हमारा मस्तिक्ष सदैव भूत, भविष्य में विचरण करता रहता है l इसका दुष्प्रभाव है हमारे ध्यान का विस्मृत होना हमारे होश का खोना l और जीवन मात्र होश है, बेहोशी मृत्यु तुल्य है, अंतिम बेहोशी को ही मृत्यु कहा गया है l हम कितने जीवित है यह इस पर निर्भर है की हम कितने होश में हैं l हमारा ध्यान इतना अधिक भंग है की हम किसी भी  विषय , व्यक्ति या वस्तु को समझ ही नहीं पाते हैं l हमे जो भी किसी भी व्यक्ति, विषय या वस्तु के बारें में समाज या उस व्यक्ति द्वारा खुद बता दिया जाता है हम उसे सत्य मान लेते हैं, कारण यह की हम वर्तमान में टिकना ही नहीं चाहते हैं l हम किसी भी चीज़ का विच्छेदन एवं विश्लेषण करना ही नहीं कहते हैं, बस बेहोश रहना चाहते हैं l कोई व्यक्ति हमसे सतही तौर पर मीठी बात कर लेता है तो हम उससे संत शिरोमणि समझने लगते हैं, कोई हमारे मापदंडो के अनुसार हमसे बात नहीं करता तो वह व्यक्ति हमे बुरा मालूम देता है l कारण यह है की हम गहरायी में उतरना नहीं चाहते, हम अज्ञानता बेहोशी में ही खुश हैं l यही कारण है की आज कल विज्ञापन पर इतना खर्चा किया जाते है l हर व्यक्ति एवम वस्तु चिल्ला चिल्ला के अपनी खूबी गिना रही है l वजह स्पष्ट है की हम अपनी दृष्टि का उपयोग नहीं करते l हम तो अपने दाँतों को ब्रश करते समय भी होश में नहीं होते, हमारा शरीर उस समय स्नानघर में होता है लेकिन मस्तिक्ष कही और l

 

इसका दुष्परिणाम यह है की हम सत्य से दूर होते हैं, सत्य को जानना ध्यान से ही संभव है और हम ध्यानविहीन हैं l भारत की परंपरा रही है सत्य को देखना, जिससे मोक्ष, निर्वाण आदि नमो से बुलाया गया है l परन्तु वर्तमान में न रहने की हमारी आदत के कारण हम भारत की सत्य को खोजने वाली परंपरा को हानि पहुंचा रहें हैं l हम सबको वर्तमान की वर्तता में स्थित होने की चेष्टा करनी चाहिए l जब जिससे कार्य को कर रहे हो उसमे पूर्णता से रहे l खुद का तीन स्तर पर अवलोकन करे कार्य, विचार एवं भावना, बस देखे इन तीन विषयो को l इन तीनो को अच्छा या बुरा सही या गलत में परिभाषित न करे न कोई हिसाब किताब करे, बस इनको एक दर्शक की तरह देखे l कभी मौका निकाल के फुर्सत से बैठे, देखे पेड़ो को चहचाती चिडियो को पहाड़ो को नदी को समुद्र को, खुद की साँसों को, बस देखे l स्वः में स्थित रहे, स्वस्थ्य रहेl

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Purnendu Bajpai

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