धतूरा |
जिसे सबने ठुकराया |
जिसे स्पर्श करने की आस भी
किसी प्राणी में नहीं रहती |
जिसपर कभी किसी के
प्रेम की दृष्टि भी नहीं पड़ती |
वीरानों में अकेला ही ढलते सूरज को
रात की बाहों में पिघलता देखता है |
गुलाब की तरह
किसी प्रेमिका के
माथे पर सजने की
उसकी ना तो नियति होती है और ना ही इच्छा |
वो तो बस शिव-चरणों में अर्पित होने के लिये ही बना है |

धतूरा | कालकूट| चिता का भस्म |
जिसे कोई नहीं स्वीकारता
उसे महाकाल की शरण प्राप्त होती है |

शिव के चाहने से ही उसका अस्तित्व है और
शिव की चाहत से ही उसके जीवन की सार्थकता |

मैं |
मैं इन्सान की देह में धतूरा हूँ |
सभ्य समाज से निष्कासित |
ना किसी के नफ़रत की भागी
ना किसी के प्रेम की पात्र |
हर किसी की दृष्टि से ओझल
काम, क्रोध, मोह का ज़हर
खुद में लिये
मैं हर स्वास में
मृत्यु को भजती हूँ |
मैं…मृत्युंजय को भजती हूँ |

यही मेरे जीवन की सार्थकता है
और यही मेरा अस्तित्व |

हर-हर महादेव। हरि-हर महादेव!

समर्पित शिव/नारायण/स्वामी/माँ को जो हम पर अविचल प्रेम तब भी लुटाते हैं जब हमारी भक्ति सूख जाती है। जो मनुष्य की तरह दूसरों का परित्याग नहीं करतें चाहे परिस्थिति कुछ भी हो।

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Snigdha

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