सृष्टि की सम्पन्नता पर गर्व है मुझे,
ये ही एक रचना है जहाँ कुछ भी अधूरा नहीं,
और पूरा होने की होड़ नहीं,
ये न कुछ काम है, न कुछ ज्यादा,
यहाँ पहाड़ हैं, नदी भी, जीव हैं जंतु भी,
पक्षी हैं, जलचर भी, सूरज भी है, चन्द्रमा भी,
पृथ्वी भी है और उस पर मनुष्य भी,
असीम सुंदरता का एक मात्र उदहारण,
और सब कुछ अपने प्रवाह में बहता चला जा रहा है,
ये सतत प्रवाह किसी के लिए न रुका है न रुकेगा,
यहाँ शोरगुल है और उसी शोरगुल के बीच एक गहरा सन्नाटा भी,
नदी के पानी की कलकल हो या पक्षियों की चहचहाट,
पशुओं का गुर्राना हो या वृक्षों की सरसराहट,
यहाँ डर भी है और शांति भी,
क्रोध भी है और प्रेम भी,
ऐसा लगता है मानो ये मेरा शरीर और मैं इसका एक अंग जिसे काट कर अलग कर दिया गया हो,
सब कुछ मुझ में समा जाने को आतुर है, और मुझमे से कुछ निकलकर इससे मिल जाने को लालायित,
पर जाने क्या होगा और कैसे होगा,
इसी उधेड़भुन में मैं इस ओर किनारे बैठा हूँ और उस ओर जाने की प्रतीक्षा है,
पता नहीं कि कोई आएगा और मेरा हाथ पकड़कर इस नदी को पार कराएगा,
या फिर खुद मुझे ही प्रयास करना होगा,
कभी-कभी लगता है इस नदी को पार कर जाना ही मेरी प्रकृति है,
पर फिर डर लगता है की कहीं डूब गया तो,
इसीलिए तैरना सीख रहा हूँ और उम्मीद है की कोई सीखने वाला भी मिलेगा