गोधुलि का समय था | आसमान पर गहरे लाल और नारंगी रंग छिटे हुए थे | सात साल की मुनिया हाथ में पूजा की थाली लिये मंदिर की तरफ़ तेज़ कदमों से चली जा रही थी| वह अपने कान्हा के लिये माला बना रही थी इसलिये घर से निकलने में काफ़ी देर हो गयी थी | उपर से जन्माष्टमी | बाँके- बिहारी के दरबार में तो वैसे भी लोगों का ताँता लगा रहता है | आज तो ना जाने बिहारी जी दर्शन देंगे भी या नहीं |

यही सब बातें सोचते-सोचते मुनिया किसी तरह मंदिर पहुँची | भीड़ इतनी कि मानों सब एक दूसरे को कुचल ही डालेंगे आज | घबराई- सी मुनिया ने बड़ी ही मासूमियत से मन ही मन अपने कान्हा से पूछा, ”तुम आज दर्शन नहीं दोगे क्या मुझे कान्हा ?देखो मैनें आज तुम्हारे लिये माला भी बनाई है|” उसकी बातें खत्म भी नहीं हो पाई थी कि भीड़ के एक ज़ोरदार झटके से उसकी पूरी थाली गिर गयी | कान्हा के दर्शन की आखरी उम्मीद तब टूट गयी जब उसके इतने प्यार से बनाई माला को कुचलते हुए भीड़ आगे बढ गयी | अब उसके हाथ में केवल दक्षिणा के पैसे थे, 20 रुपये , जो उसे चैत्र नवरात्र के दौरान कन्या भोजन में मिले थे| उसने सोचा था अपने कान्हा को अर्पित कर देगी अपने बचाए हुए पैसे।

मुनिया आँख में आँसू लिये भीड़ को चीरती हुई बाहर आई और एक कोनें में बैठ कर रोने लगी | तभी कहीं से एक रोता हुआ बच्चा आया,करीब दो -तीन साल का | अकेला था | मुनिया नें उस बच्चे को पास बुलाया और उसका नाम पूछा | वह बच्चा बस रोता ही जा रहा था | उसने आस-पास देखा तो उसके माँ-बाप कहीं आते ना दिखें | तभी उसकी नज़र बच्चे के खून-सनें घुटनों पर पढी | वह बुरी तरह ज़ख्मी था |

मुनिया नें अपने बहते आँसू भूलकर उस बच्चे की आँखें पोंछी और उसे गोद में उठा कर पास के दवाई के दुकान में पहुँची और दुकान वाले भैया से बोली, ”भैया, थोड़ी सी रूई की फाहें, एक पट्टी और एक डिटौल दे दीजिये|” जब-जब मुनिया गिर जाती थी तो माँ इन्ही सब से उसके घाव की पट्टी करती थी | दुकान वाले भैय्या नें समान लाकर दिया पर मुनिया के पास सिर्फ वह 20 रुपये ही थे | भैया सब देख रहे थें, मुस्कुराकर बोलें, ”तू रख ले, बिटिया | इन्सानियत का क्या मोल लगाऊँ !” सात साल की मुनिया को, इन्सानियत क्या होती है, इसकी समझ कहाँ थी | वह तो दक्षिणा के 20 रुपये पकडा के जल्दी से भागी|

मंदिर में लगे लाउड-स्पीकर से घोषणा हुई, ”श्री कृष्ण का अभिषेक प्रारंम्भ होने जा रहा है|”

उधर वेद-मंत्रों के साथ मंदिर में बिहारी जी का अभिषेक हो रहा था इधर छोटी सी मुनिया पास के नल से अपने नन्हे हाथों में पानी लेकर,उस बच्चे के खून से लथपथ घुटनें धो रही थी|

उधर बिहारी जी को चंदन लगाया जा रहा था, इधर मुनिया रूई डिटौल में डूबो कर बच्चे के घुटनों पर लगा रही थी |

उधर बिहारी जी को सफ़ेद फूलों के हार से सज्जित किया जा रहा था, इधर मुनिया भरसक कोशिश में लगी थी कि किसी तरह सफ़ेद पट्टी बच्चे के घुटने पर बाँध दे |

बच्चा अब नहीं रो रहा था | बल्कि मुनिया की तरफ़ देख कर मुस्कुरा रहा था| जैसे-तैसे पट्टी बाँधकर मुनिया उसकी तरफ़ देखी और वह भी मुस्कुरा दी | पीछे कृष्ण जी के मंदिर से एक अवाज़ पूरे वृन्दावन की गलियों में गूंज गयी, ”बोलो बांके-बिहारी लाल की जय |”

दर-दर भटकता हुआ जिस खुदा को तू मंदिर-मस्जिद में ढूँढता है,

मैनें सुना है, काफ़ी दिनों से वो इन्सानों में मिलता है |

Dedicated to Swamiji whose very life has become a living example of Seva, the highest form of worship.

गोधूलि – twilight
नारंगी – the colour orange
दरबार – usually used for a king’s court. Also, used for temples as the Lord is the ultimate emperor of the universe
लोगों का ताँता – crowd
मासूमियत – innocence
अर्पित – to offer with reverence
ज़ख़्मी – wounded
घोषणा – announcement
रूई – cotton
इंसानियत – humanityPicture Courtesy: Karshan Odedra

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