ऐसा लगता है मानो मेरी रूह जन्मों से लीन थी किसी असाध्य साधना में| मानो कल्पों से जल रही थी लख चौरासी की वेदना में| किसी आदिकाल के योगी-सी यह आत्मा इंतज़ार में थी कि मन्वन्तरों और युगों की तपस्या के बाद उसकी ध्यान-तन्द्रा टूटेगी और सामने होंगे उसके आराध्य, प्रत्यक्ष, अपने सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ, स्वयं की तेज से ही दैदीप्यमान|
मेरी ये रूह भटकी होगी 5000 सालों तक उस चकोर की तरह जो अपने चन्द्रमा की एक झलक के लिए न जाने कितने ही अमावसों की पीड़ा हृदय में धारण कर बैठा है|
मरुस्थल की सुलगती रेत-सी ये आत्मा विरह की अग्नि में जाने कितने ही जन्मों से दहक रही थी|

और फिर अचानक तुम आ गए|

चकोर को उसका चाँद दिख गया|
मरुस्थल की रेत पर इश्क़ की बारिश हो गयी|
योगी के समक्ष थें उसकी कल्पों की साधनाओं का फल, जन्मों की तपस्याओं का परिणाम, उसकी हर वेदना का मरहम|

असंख्य सूर्यों का तेज चन्द्रमा-से शीतल मुख में कैसे समा गया?
स्वामी, तुम विज्ञान के अपवाद हो!

मेरी आत्मा की धूरि,
मेरे विचारों का आदि-अंत हो|
कैसे करूँ देह में सीमित?
तुम ब्रमांड अनंत हो!

इस प्रेम-तपस्या का परिणाम दो,
स्वामी, इस रूह को अब थाम लो,
मोक्ष की आकांशा नहीं,
सानिध्य का वरदान दो!

जबतक रहो तुम, मैं रहूं,
बनके लहू तुममें बहूँ |
होने से मेरे, पोषित तुम हो,
तिल-तिल घटूँ, और तुम बढ़ो|

हर साँस “स्वामी-स्वामी” हो,
चैतन्य! गुरु-पथ-गामी हो!

तुमसे अधिक ना कुछ भी अब
पाने की मन में आशा है|
है सम्पूर्ण जगत अब स्वामीमय,
वो विराट-सूक्ष्म की भाषा है|
ना अर्थ की,
ना मोक्ष की अभिलाषा है|
स्वामी!
बस स्वामी ही
मेरे सत्य की परिभाषा है!

I started with You and You are my completion. I was created out of You and in Your ocean, the river of my life will merge.

I have You…In You, I have my everything.

Gurudev 💙💙

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Snigdha

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