भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३४३ हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित करती है।हमारे संविधान के आठवीं अनुसूची में बाईस भाषाओं का उल्लेख है आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इसमें इंग्लिश नहीं है। मै ये नहीं कहता कि अंग्रेजी आवश्यक नहीं है।ये जरूरी है पर हिन्दी को पतन के गर्त में डालने की शर्त पर नहीं।हम देखते हैं कि जब हिन्दी में कुछ लिखता हूं तो एक तरह से इसे उपेक्षित भाव से लिया जाता है।ये मेरी ही नहीं हर मातृभाषा के सम्मान करने वाले को इस बात से रूबरू होना पड़ता है।
1935 में जब देश का वायसराय लार्ड कैनीन था तो उसने मैकाले शिक्षा पद्धति लागू की थी जिसके तहत भारत के अभी संस्कृ विश्वविद्यालय बन्द करवा दिए गए थे।भारतीयों के मन में एक हीन भावना भर दी गई।उसने अपने पिता को लेटर लिखा था कि मैं भारतीयों को सिर्फ शरीर से ही नहीं मन से भी मानसिक गुलाम बना रहा हूं।भारतीय शरीर से तो होंगे पर दिलो दिमाग से हमारे ही वैचारिक गुलाम होंगे।ये मै अपनी बात नहीं थोप रहा। मै अंग्रेजी का भी विरोध नहीं कर रहा लेकिन इस बात की ओर इंगित करता हूं कि कहीं न कहीं हम अपनी वास्तविक पहचान खो रहे हैं।जब हमारी संवैधानिक ,राजकीय भाषा का सम्मान नहीं रह जाएगा,जब अपनी ही सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा ।क्या मात्र हिन्दी दिवस मनाने से या कुछ औचारिकताएं निभा लेने से हम हिन्दी की सांस्कृतिक विरासत को बचा पाएंगे।शायद कभी नहीं।
आज संयुक्त राष्ट्र उर्दू को ऑफिसियल लेंग्वेज का दर्जा मिला हुआ है।हमारी हिन्दी का सम्मान संयुक्त अरब अमीरात में द्वितीय राजकीय भाषा के रूप में मिलता है पर हम भारतीय ही इसका सम्मान नहीं करते।ऐसा लगता है कि हिन्दी नहीं जानकर हम काफी सभ्य माने जाएंगे।हमारे अंदर कहीं न कहीं ये बात बैठा दी गई है कि हिन्दी में बोलना लिखना पढ़ना ये सब पिछड़ेपन कि निशानी है।आज के बच्चो को हिन्दी मे सौ तक की गिनती नहीं आती ।कोई अगर दस लाइन इंग्लिश बोल दे तो सामने वाले एकदम से उसके सामने तीर की तरह झुक जाता है अदब से।क्यू जी इतना ज्यादा महत्व विदेशी भाषा को और अपनी चीजों का इतना अपमान क्यू।आखिर अंग्रेजी भी तो एक भाषा मात्र है।जैसे हमारे यहां का हर कोई हिन्दी बोल लेता है वैसे ही वेस्टर्न कल्चर वाले इंग्लिश बोल लेते हैं।जब वो अपनी भाषा से समझौता नहीं करते तो हम क्यों करें। मै तो शान से अपनी भाषा का प्रयोग करता हूं ।कोई हिचक नहीं मुझे।क्युकी हम अपने प्रतिनिधित्व करने वाले खुद हैं।ये नियम है कि हम अपनी चीजों का सम्मान करेंगे तभी दूसरे भी उसका सम्मान करेंगे।
मै बहुत से अमेरिकी संत साधुओं से मिला हूं जो यहां रहकर हमारे सनातन धर्म की सेवा और साधना करते हैं लेकिन वो अपनी भाषा से कभी समझौता नहीं करते।आप देख लो दुनिया के सबसे विकसित देशों में गिने जाने वाले चीन, जापान,फ्रांस, रूस जैसे विकसित देश अपनी भाषा से सारे कार्य करते हैं।उनकी राजभाषा इंग्लिश नहीं है।क्या ये फार्मूला हमारे देश मे लागू नहीं हो सकती है।क्या यहां के शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार नहीं हो सकता।मान लो कोई युवा है वो अपने आर्ष ग्रंथ पढ़ना चाहता है।उसने गीता पढ़नी शुरू की ।उसे शब्द मिला”स्थितप्रग्यता” उसे पढ़ना है बृहदारण्यकउपनिषद् ,,,,,,,,अब वो इन शब्दों के न तो उच्चारण कर पाएगा और अर्थ जानना तो दूर की बात है।आप ही बताओ क्या वो अपने धर्म के वास्तविक स्वरूप को जान पाएगा।अंग्रेजी भी एक भाषा मात्र ही है।आपको जानकर हैरानी होगी कि इंग्लिश के कुछ रूट वर्ड संस्कृत से निकले हैं। त्रिकोणिति से निकला है trigonometry,, मातृ से matri पितृ से patri इस तरह के बहुत से शब्दों की संरचना संस्कृत से हुई है।
आखिर में फिर से कहता हूं कि हमें किसी भी भाषा से नफ़रत नहीं पर अपनी भाषा के संवर्धन से प्रेम है। हमें भी विकास और ग्लोबलाइजेशन चाहिए पर अपनी भाषा को कुचल कर नहीं।सुषमा स्वराज जी की एक पंक्ति याद आ रही है लिख देता हूं”अग्रेंजी बोलने वाला विश्व को व्यापार समझता है पर हिन्दी और संस्कृत वाला विश्व को परिवार”।इतना ही 🌻🌻🥀🥀🌱🌱राधे श्याम

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Ashu Harivanshi

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