Amit's writings


मुझे मेरा ही घर अजीब लगा –...

कपाट हृदय के बंद रख देखता रहा, अब तक घर अपना आज माना

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लाली खोजन मैं गई, मैं भी हो...

सागर का अस्तित्व ही बूँद का अस्तित्व हो जाता है

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वादों से, विवादों से नहीं मिलता –...

उन लोगों को, जिनमें मैं स्वयं को भी मानता हूँ, यह कविता समर्पित है

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चीटीं का भविष्य — स्वरचित कविता #3

लक्ष्य व भविष्य अस्तित्व के मूल में नहीं है, सभी कुछ सर्वथा वर्तमान है...

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स्वयं के जीवन का जिम्मेदार स्वयं होना

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्

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वह पृष्ठ कोरा ही क्यों? – स्वरचित...

योगेश्वर श्री कृष्ण पर हिंदी कविता - Poem #2

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Thoughts of meaningful life- My 1st post...

God gave me a body, but I made it my bondage. He gave me...

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